Wednesday, 16 June 2021

5. || विज्ञान व धर्म को खोजता बचपन ||


 ज़िन्दगी का मज़ा तब ज़्यादा आता है जब दिलों में मौसम अपना अहसास छोड़ जाते हों, फूलों की महक मिट्टी की सौंधी खुशबू से अलग महसूस होती हो। हमारे बचपन के बहुत से साल होते हैं जिसमें बरसात के छिछले पानी में कागज़ से बनी नाव बिन डूबे दूर तलक जाती थी। उस वक़्त कागज़ की नाव बनाने के कारीगरी मुहल्ले के कुछ बच्चों के हाथों में थी, जो अपनी इस तकनीकी विधा के एकमात्र पुरोधा थे। मुझे काफी दिनों बाद नाव बनाना आया । बहुत जल्द फेंकी हुई नाव को सुखाकर उसके मोड़ देख मैंने भी उसे बनाना सीख लिया। 


कागज़ की किश्ती पानी में दौड़ती थी और शुरुवाती बरसात में काले रंग की डंक वाली चींटियां घर के अंदर, कभी चौखट पर कभी ज़मीन पर। कुछ दिनों में उनके पंख निकल जाते। दिमाग़ अक्सर मनन करता कि कागज़ की कश्ती पतवार बिना पानी के सहारे भीग कर दूर निकल जाती थी और चींटी अपने नए पंखों से क्यों नहीं उड़ पाती थी।


धर्म में भक्ति व पूजन भारतीय समाज का अभिन्न अंग रहा है। मुझे भी बड़े लोग बताते कि पृथ्वी कृष्ण के मुख के भीतर है। गैलीलियो से पहले के वैज्ञानिकों की खोज धर्म के आगे   नेस्तनाबूत हो जाती है। कृष्ण के मुख के आकार की कल्पना से पहले पृथ्वी शब्द लिखने में मैंने कई बार गलतियां की। एक दिन एक सरदार अंकल हमारे घर आए। उन्होंने मेरी कॉपी उठायी और कहा,

" बहुत सोणी राइटिंग है पर ये पृथ्वी ग़लत लिखा है।"

उन्होंने पेंसिल उठायी व मेरे कागज़ में लिखे गए प्रथ्वी का र का हाथ पकड़कर प के नीचे बैठा दिया। और कहने लगे,

" ऋ की मात्रा होती है इसमें "

मात्राओं की भयावहता को मैंने प्रथम बार महसूस किया । 


टेलीविजन के परंपरावादी धारावाहिकों में भगवान विष्णु के कृष्ण अवतार की कल्पना अधिक प्रबल थी। उसमें यशोदा माता कृष्ण के मुख के भीतर घूमती पृथ्वी सहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड देखकर बेहोश हो गयी थी। बड़े लोगों द्वारा अक्सर धर्म के प्रश्नों को बालमन के अंतस तक उतारने के लिए कई नए मिथक गढ़ दिए जाते। धर्म के बारे में हम दोनों भाई - बहन बातें करते। 

एक दिन मैंने उससे पूछा 

"कृष्ण का आकार कितना बड़ा होगा?"

" हम कल्पना नहीं कर सकते । पता नहीं ... शायद हो भी।" उसने कहा।


" वो राजा बलि वाली कहानी भी समझ नहीं आयी। वामन अवतार का इतना बड़ा पैर कैसे हो सकता है ।" मैंने कहा।


" कहानियां बनायी हुई हैं। काफी सदियों बाद कई लोग भगवान बन जाते हैं।" उसने कहा।


" तो फिर किताबों में पृथ्वी को सूरज के चारों और घूमते क्यों दिखाते हैं। कृष्ण का मुँह क्यों नहीं दिखाते? " मैंने कहा।


" कहानियाँ अलग होती है। हमारे देश में पत्थर भी पूजे जाते हैं इसलिए धर्म को मानते हैं, विज्ञान अलग होता है।" उसने कहा।


इन बातों से मुझे कोई खास उपलब्धि नहीं हुई। एक दिन किताब में गौतम बुद्ध की कहानी पढ़ी। उसमें सबसे बुरा अनुभव देने वाला अंश शवयात्रा का था। उसके बाद रोज नए प्रश्न मुझे घेरते। कई दिनों तक मैं सोचती कि " मैं कौन हूँ? मुझे मेरा नाम क्यों पता है... मुझे क्या करना है। ये वाणी कहाँ से आती है । जब मरना ही है तो फिर जीना ही क्यों है?" 


 जीवन के नए साक्षात्कार यादों का हिस्सा बनने के लिए तैयार थे। पृथ्वी के बाद अब सूरज की बारी थी। वो एक दिशा से निकलता दूसरी दिशा में छिपता। एक "चार दिशाएँ " नाम की कविता किताब में होती। जिसके निम्न बोल होते-


"उगता सूरज जिधर सामने

उधर खड़े हो मुँह करके तुम

ठीक सामने पूरब होता

और पीठ पीछे है पश्चिम


बायीं और दिशा उत्तर की

दायीं और तुम्हारे दक्षिण

चार दिशाएँ होती हैं यों

पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण ।"


उस समय ये बेहद कठिन काम था कि दाई-बाई दिशा किस हाथ पर होगी। लेकिन अंततः 'द' से दाहिना व दक्खिन का मेल करके ये याद किया गया। सूरज के लाल -पीले होने का कारण भी कोई नहीं बताता था। मेरे साथ के बच्चे मेरी तरह बात नहीं करते थे। उन्हें किसी तरह की जिज्ञासा नहीं होती। अक्सर मेरे प्रश्न मेरे मन से जवाब माँगते। घर के आँगन में खड़े होने पर मैंने सूर्य को कई बार देखा । अक्सर लोग सूर्य को जल चढ़ाते। सूर्य की पहचान ग्रह व देव के बीच दुविधा में रह जाती। वो शाम को ज़मीन के नीचे छिप जाता। एक दिन मैंने उस बड़े फार्म में दूर तक दौड़ लगाई लेकिन मैं जितना आगे जाती धरती का किनारा मेरे हाथ नहीं आया। 

पाँचवी क्लास में यादव सर ब्लैकबोर्ड की और मुख करके पृथ्वी का चित्र बनाते हुए बोले, 

"पृथ्वी अपनी धुरी पर घूर्णन करती है..."

इससे पहले कि वो कुछ आगे कहते, मैंने तपाक से पूछ लिया, 

" लेकिन ये हिलती क्यों नहीं? हम सब कोनों पर गिरते क्यों नहीं?"

" ह्म्म्म, क्योंकि पृथ्वी में बहुत बड़ा चुंबक है जो सबको पकड़कर रखता है और गिरने नहीं देता। इस चुम्बक के कारण पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण उत्पन्न होता है। इससे घूमने का मालूम नहीं चलता ।" उन्होंने कहा।

"लेकिन...." 

"वो सब हम बड़ी क्लास में पढ़ेंगे।" उन्होंने कहा।

न मुझे कृष्ण के मुख का आकार मालूम हुआ और न ही गुरुत्व का ये चुम्बक। सूरज की कहानी अलग चलती थी। उधर कविता व यथार्थ में चाँद का झिंगोला भी घट-बढ़ रहा था। मैं चाँद में सूत कातती बुढ़िया को देखना चाहती लेकिन मुझे हमेशा एक चेहरा उसमें नज़र आता जो कभी उदास होता और कभी मुस्कुराता।


2 comments:

  1. बचपन में प्रश्नों का मन मे आना स्वाभाविक है किंतु यदि नकारात्मक प्रतिक्रिया प्राप्त होती है तो बच्चे प्रश्न पूछना बंद कर देते हैं।
    मां बाप झूठे जवाबों से बच्चों को बहलाने का प्रयास करते हैं । जो बच्चे बचपन में बहल जाते हैं वे जीवन भर लकीर के फकीर बने रहते हैं।
    मां बाप सोचते हैं वे जीत गए लेकिन वे हार जाते हैं ।

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  2. शानदार पोस्ट/आलेख।हार्दिक शुभकामनाएं

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