Saturday, 16 November 2024

|| 6 || टिक- टिक करती तीन घड़ियां

बचपन से समय को हाथ में पहनने की ख्वाहिश थी। ग्यारहवीं कक्षा की बात है। माँ ने कहा था कि यदि यू 0पी 0 बोर्ड में फर्स्ट डिविजन आई तो वह मेरे लिए एक घड़ी मंगवा देगी। याने घड़ी के लिए समय का इंतज़ार तो था ही और शर्त भी थोड़ी कठिन थी। मन तो चाहता था कि पहले मेरी माँ इतनी कठिन किताबें पढ़ के तो देखे....लेकिन मरता क्या न करता? अन्य लड़कियों के हाथों की घड़ियाँ देखते -देखते मन कुढ़ता लेकिन टाइटन की घड़ी को पहनने के शौक़ में पढ़ाई में बहुत मेहनत की। उस समय टाइटन की घड़ी के सूक्ष्म चलचित्र दूरदर्शन पर चलते थे। इसके अलावा कोई ब्रांड नहीं सुना सिवाय इस कथन के कि स्विस घड़ियां दुनिया की सबसे बेहतर घड़ियां हैं। अब ये भी कहा जा सकता है कि मेरी जानकारी ही सीमित रही हो क्योंकि उस समय मेरे साथ की लड़कियों के घर में केवल वाले कनेक्शन थे और मेरे यहां दूरदर्शन।


अब बारहवीं की बोर्ड परीक्षा खत्म हुई। कई स्याह पन्नों में मेरे संभावित प्राप्त अंकों के जोड़ कबाड़ में बदल रहे थे। ऐसे ही पन्नों को भरते हुए समय गुज़रता। कुछ दिन आपके जीवन में बेहद खास होते हैं इसलिए बहुत कुछ याद रह जाता है। हम सरकारी प्रांगण में रहते थे। पशुपालन विभाग की नाइट्रोजन उत्पादन यूनिट का विशाल मुख्य गेट था। वह आसमानी से रंग का था। कुछ वक़्त पहले तक भी वह आसमानी रंग में ही था। मेरे बचपन की दिनों में ये इतना विशाल होता था कि इसी पर हम सारे बच्चे बारी - बारी से झूलते ....और तब तक झूलते जब तक कोई खूंखार आवाज़ हमें न भगाती। उस मुख्य गेट के बाहर पुलिया है जिस पर दोनों और सीमेंट की बेंचनुमा संरचनाएं हैं। पुलिया पर बैठकर आप सड़क में आने -जाने वाले लोगों को देखते हैं। 1999 में 20 जून के बाद की कोई तारीख़ रही होगी मै उसी पुलिया पर बैठी थी। उन दिनों रिज़ल्ट अख़बार में आता था। मुहल्ले का एक लड़का अख़बार लेने गया था। रिजल्ट वाले दिन अख़बार का मिलना भी मुश्किल होता और उसके दाम भी बढ़ जाते। ख़ैर दिल अपनी धड़कनों के ऐसे फेर में था कि हाथों के पोर ठंडे हो रहे थे। अचानक वहां मोहल्ले का वो लड़का साइकिल में अख़बार लेकर आया। उसने मुझे देखते ही कह दिया, ' आपका रोल नंबर नहीं मिला।'

' झूठ...' मेरी मुखमुद्रा बदलने से पहले ही वो कहने लगा 'फर्स्ट डिविजन '

' लाओ मुझे दो अख़बार '

'दूसरे लोगों को भी बताना है ' उसने कहा।

' मैं उसके हाथ से अख़बार छीन भाग गई। ' ये मेरे जीवन का सबसे ख़ास दिन था जिसे मैंने अपनी मेहनत से प्राप्त किया था। ख़ुशी दोहरी थी क्योंकि अब वक़्त को घड़ी के रूप में बंधना था। ड्रेस से मुक्ति मिली थी। रंग वाले कपड़े पहन कॉलेज जाना था। हां बस एक ही कठिनाई शेष थी कि डॉक्टर बनने की कुछ परीक्षाएं देनी थी।


दूरदर्शन के विज्ञापन में दिखाई जाने वाली घड़ी सुनहरी चेन के साथ होती इसलिए मैंने भी कल्पना की थी। मेरे मामा आर्मी कैंटीन से सोनाटा की घड़ी लाए जिसमें काले रंग का फीता था। कैंटीन में इसके लिए लगभग 1200 रुपए चुकाए गए थे। जब मैंने इस घड़ी को देखा तो मेरी कल्पना तार -तार हो गई लेकिन कुछ नहीं से कुछ अच्छा बेहतर होता है। मामा उसे बदलवाने दोबारा तो जाते नहीं और फिर ये मेरे जीवन की पहली घड़ी भी तो थी। कुछ अच्छा करूंगी तो शायद इससे अच्छी भी मिल जाए। बेमन से ही सही लेकिन अपने बाएं हाथ में मैंने उस फीते को बांधा। उस घड़ी के साथ कुछ समय बीता और मेरा एक विश्वविद्यालय में दाख़िला हो गया। उस विश्वविद्यालय में काफ़ी कॉलेज थे। कतिपय समकालीन कारणों से अच्छा रैंक आने पर भी मुझे वहां भी मनचाहा कॉलेज न मिल सका। यहां पर दुनिया के प्रपंच देख मेरा मन बिलख -बिलख कर रोने लगा। मुझे अच्छी तरह याद है कि उस रात कष्ट मेरी आंखों से बह रहा था। बड़े भाई ने मुझे बच्चों की तरह संभाला उसने मुझे कलाम साहब के बारे में बताया और उनके इच्छित जगह पर चयनित न होने पर उनकी देहरादून से ऋषिकेश की पैदल यात्रा के बारे में बताया। उनकी इस थकावट पर किसी बाबा ने उनसे कहा , ' ये तो बहुत छोटी जगह है, तुझे तो बहुत दूर जाना है।' मैं ये कहानियां सुन रही थी। आंसू नहीं थम रहे थे। मेरे भाई ने मेरे घड़ी वाले बाएं हाथ को घंटों पकड़े रखा और देर रात तक हम दोनों उस परिसर की सड़कों पर हाथ थामे घूमते रहे। बहुत सारे लोग काउंसलिंग के लिए आए थे इसलिए उस रोज़ रात जिंदा थी लेकिन मेरा मन गलत नीति मानने के लिए कतई तैयार नहीं था। मेरे भाई को भी सब मालूम था बावजूद इसके वो नहीं चाहता था कि मैं हार जाऊं। मेरे लिए उस दिन की जीत किसी काम की नहीं थी। अंततः दाखिले के बाद मैं वहां रहने लगी।


विश्वविद्यालय में अभियंत्रण कॉलेज का एक लड़का था, जो एक ज़माने में मेरी सहेली को पसंद करता था। उसका नाम विशाल था। वो मुझे वहां मिल गया। वो मेरे ही शहर का लड़का था। हम कभी- कभार सप्ताह में चाय साथ में पी लिया करते थे। उसकी टेक्निकल बातें मेरी समझ से दूर थी लेकिन फिर भी उस अंजान जगह में उसका होना मुझे तसल्ली देता था। एक दिन उसने कहा कि वो कॉलेज की तरफ़ से एक महीने के लिए मुंबई जा रहा है। मैने कहा, 'अरे वाह । बहुत घूमना '। 

उसने मुझसे पूछा, 'तुम्हें कुछ चाहिए?'

' नहीं, कुछ नहीं।'

वो महीने भर बाद वापिस आया। उसने मुझसे आँखें बंद करने को कहा। इसके बाद मेरे टेबल के ऊपर रखे बाएं हाथ में काले रंग की चैन वाली एक घड़ी बांध दी। मुझे घड़ी का आभास हुआ। आँखें खोलने पर मैने उसके दाम पूछे। उसने कहा, 'मन के उपहारों के मूल्य नहीं होते।' ये मेरे जीवन की दूसरी घड़ी थी। ये अचरज की बात है कि एक लड़के से कोई उपहार घड़ी ही मिली।


फिर समय बीता। एक नोकरी लग गई तो एक घड़ी खरीदी। अब दूरदर्शन से बहुत आगे का ज़माना आ चुका था लेकिन मेरी टाइटन लिखे डॉयल की घड़ी उस दिन वहां नहीं मिली । उस दिन अपनी कमाई से पहली घड़ी ली। ये घड़ी भी सोनाटा की थी। ये मात्र 2000 रुपए की थी। एक दिन ये बाज़ार में कहीं खो गई। उसके बाद फिर एक अन्य सोनाटा घड़ी 3000 रुपए की खरीदी। माने सोनाटा ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा।


मेरे भाई के हाथ में भी एक घड़ी थी। वो पुलिया, जिसका ज़िक्र शुरू में किया है। उसी पुलिया पर उसका एक्सीडेंट हुआ। फर्स्ट आने की खुशी भी इसी जगह पर मिली और ज़िंदगी का सबसे बड़ा दुःख भी इसी स्थान पर हमेशा के लिए चिरस्थाई हो गया। कुछ समय पहले उस पुलिया को देखा था। आज भी उस एक्सीडेंट की दरार दिखाई देती है। उसी हादसे ने मेरे भाई और उसकी घड़ी की धड़कन को बंद कर दिया। वो तो नहीं है लेकिन उसके हाथों से छुआ नोट, उसके कपड़े और वो घड़ी मैंने रख ली। उस घड़ी को बड़ी मुश्किल से ठीक कराया। जब उसकी धड़कन मेरे बाएं हाथ में वापिस धड़की तो लगा वक़्त वापिस आ गया है। मुझे तो बहुत सारा सुकून उन चीज़ों से मिलता है जिन्हें लोग निर्जीव कहते हैं। 


फिर एक बहुत लंबे वक्त के बाद टाइटन वाली दुकान पर गई। एक विदेशी घड़ी पसंद आई। मेरे मुताबिक बहुत महंगी थी। मैं वहां अक्सर जाती इस उम्मीद में कि क्या पता कोई ऑफर ही आ जाए। लेकिन दो साल तक भी वो घड़ी ऑनलाइन या ऑफलाइन उतने ही दामों पर टिकी रही। ये बात मेरे जीवन के सबसे बेहतर आदमी को मालूम हो गई और ये घड़ी मेरे जन्मदिन पर उपहार में मिल गई। मैं सोचती हूं हर दशक में आदमी के विचार एवं व्यक्तित्व में परिवर्तन आता है। मेरे बाएं हाथ के लिए अब तीन घड़ियां हैं। एक मेरी कमाई की, एक मेरे भाई की और एक उस बेहतर आदमी की। तीनों की अपनी कीमत है। काश मेरे जीने तक तीनों की धड़कने मेरे दिल से आती हुई बाएं हाथ की धड़कन के साथ मिलकर टिक -टिक करती रहे। अब टाइटन लिखे डॉयल में समय को बांधने की इच्छा शेष नहीं । जो समय शेष है वो इन घड़ियों के साथ बीते।

||9|| स्नेहा और गणित -दो

उसका नाम स्नेहा गुप्ता था। उसका पूरा व्यक्तित्व बेहद प्रभावित कर देने वाला था। उसके काले रेशमी बाल बेहद घने थे जो बड़ी मुश्किल से जबरन किसी ब...