Thursday, 6 February 2025

||8|| बदलती सभ्यताएं और बदलता ' मनुष्य '


इतिहास बताता है सारी सभ्यताएं नदियों के किनारे बसती रही या कहा जाए कि जीवन पानी के किनारे ही समृद्ध होता है। आज भी भूगर्भवेत्ताओ को पहली नदी सभ्यता का प्रमाण रही सिंधु घाटी अपनी खंड- खंड हुई धरा के गर्भ में बड़े अन्न कोठार, स्नानागार, धर्म, नगर उत्कृष्टता, शिल्प आदि चीख- चीख कर अपना अस्तित्व बता रही है। इसी प्रकार मगध की समृद्धि अवशेष भी बिहार में विद्यमान है। लब्बोलुआब ये है कि सम्पन्नता एवं विपन्नता एक सिक्के के दो पहलू हैं। व्यक्ति, राष्ट्र, विचारधारा संबंधी विषयों पर भी कमोबेश एक सी ही संकल्पना  है। कहा जा सकता है कि व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य में सुख व दुःख की परिकल्पनाएं होती हैं। पुरातन नदी घाटी सभ्यताओं से होकर वर्तमान मानवमूल्यों तक पहुंचने में भी सदी ने बचपन से लेकर प्रौढता देखी है... बिलकुल मेरी और आपकी तरह। 


     शैशव अवस्था में बहुत सी बातों के प्रति हम उत्सुक रहते हैं। मैंने वो उत्सुकता महसूस की है। जानने की इच्छा स्वयं के अनुभवों से शनै- शनै मस्तिष्क में घर करती है। ये जीवन जीने के लिए अच्छा है। मुझे याद है मेरे घर से दिखते पहाड़ों पर जाने के लिए मैं रोज़ शाम को तैयार होती....अकेले भागती, किंतु पहाड़ कभी नज़दीक नहीं आया । ऐसे ही कई ओर बातें थी धरती का गोल होना , बादलों के रंग के नाम की लाल- नीली परियां सब कुछ अदभुत था। 


          चंद्रमा का मुख वैसा ही दिखता है जैसा बचपन में देखा था। वो वृद्ध नहीं हुआ आज भी वैसा ही शांत है। एक गीत"जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा" में नायिका चांद से उतरते दिखाई गई। दूरदर्शन के धारावाहिक में जब धरती कृष्ण मुख भीतर घूमी तो मेरा मन सहम गया। सब मेरी कल्पनाओं में हकीकत की तरह बसता गया। विज्ञान में अध्यापक हमें बताते कि हर चीज एक निश्चित अवधि में समाप्त हो जाएगी सूरज ,चांद ...सब कुछ। मुझे बड़ा कष्ट हुआ। घर आकर मैंने ये बात अपने भाई से कही। उसने कहा, जब तक आइंस्टाइन जैसे लोग रहेंगे धरती पर अंधेरा नही होगा। उसे सुनकर बड़ा सुकून मिला कि हम ठीक रहेंगे। 


            कुछ लोगों की लाशों को ले जाते देख किसी को कहते सुना ,"सभी लोगों ने ऐसे ही जाना है"।  इस बार फिर प्रश्न समाधान हेतु मेरे पास भाई का ही विकल्प था। उसने कहा, " हम बड़े होते है और काफी समय बाद खत्म होते हैं। गाँधी जी भी खत्म हुए, लेकिन वो पीढ़ियों तक जाने जाएंगे"। मुझे उसकी बातें बिलकुल पसंद नहीं आई। कोई मर जाए उसके बाद कुछ भी हो क्या फायदा। मैं रोज़ शीशा देखती। एक -एक दिवस गुजर रहा था। जीवन उन दिनों भी ऐसे ही वक्त के हाथों से फिसल रहा था। फिर एक दिन गौतम बुद्ध की कहानी पढ़ी। उन्होंने जो भी प्रश्न चेन्ना से किए उन प्रश्नों को मैं महसूस कर चुकी थी। वृद्ध होने फिर मर जाने से मुझे भय लगता था। इससे बड़ा क्या ज्ञान था ?  मैने सिद्धार्थ की तरह घर नहीं छोड़ा लेकिन बारह बरस एक पैर पर तपस्या वाली बात पर मुझे यकीन नहीं होता था , क्योंकि मात्र एक मिनट से कम अवधि पर मैं गिर जाती।


             स्कूल के अलावा ज्ञान अर्जन का दूसरा विकल्प नहीं था। अध्यापकों द्वारा बचपन से कल्पनाशीलता वाली कहानियों के साथ मौसम, ज्वालामुखी पढ़ाए गए। इस दोहराव से मेरे बहुत सारे ' क्यों ' का जवाब नहीं मिल पाता। इन सब बातों में मुझे सुनाई गई कहानियां के साथ विज्ञान की खोज का मिश्रण था। साधारण शब्दों में कहा जाए तो दिल को भाने वाली कहानियां और विज्ञान समझने वाला दिमाग मेरे साथ बढ़ रहे थे। यह बहुत मुश्किल था कि दिल को दिमाग से अलग किया जाता । यद्यपि कल्पनाशीलता की और मेरा झुकाव था किंतु स्कूल में पास होने की अनिवार्यता ने विज्ञान को मेरे दिमाग में स्थापित कर दिया। कितनी कमाल की बात है कि यदि हम प्रेम, दर्द व पीड़ा की बात करते हैं तो दिल शब्द का प्रयोग करते हैं और यदि किसी तर्क की बात करते हैं तो दिमाग का। जबकि यह संपूर्ण कार्य वैज्ञानिक रूप से दिमाग ही करता है।


             इतनी छोटी सी दुनिया में प्रत्येक मनुष्य विभिन्न प्रकार के संघर्षों को झेलकर आगे बढ़ता है। समाज में अपना स्थान बनाता है और अपनी उपलब्धियों से संतोष प्राप्त करता है ।मनुष्य जीवन में अपने- अपने प्रकार के आदर्श स्थापित है। उन आदर्शों के तहत वह आचरण करता है। मनुष्य के समाज में शासन करने के लिए भिन्न प्रकार की युक्तियां प्राचीन काल से क्रियान्वित है। राजा का काल हो या आधुनिक शासकों की बनाई गई व्यवस्थाएं। अच्छा- बुरा, सही- गलत सभी कुछ देश,काल अनुसार परिवर्तनशील रहा है। सूखी धरती हमेशा बांझ नहीं हो सकती। जर्जर,वीरान रेत पर भी कुछ हरे तने द्रुतगति से रूपांतरित होकर कांटे बन जाते है और एक दिन उन कांटो के बीच फूल भी दिखते है। 


            परिवर्तनशीलता जीवन का यथार्थ है। इसके बावजूद संस्कार, परहितवाद, सहयोग, सामजस्य,प्रेम आदि तत्वों से मनुष्यता साकार रूप लेती है। धन से सिर्फ मनुष्य अपनी इच्छाएं पूर्ण कर सकता है। सुख की परिकल्पना धनविहीन है। आज की स्थिति में हम सब आधुनिक जगत के मशीनी उपकरण हैं। जिस तरह इतिहास के पन्नों में नदी घाटी सभ्यताएं दफन है उसी प्रकार एक दिन बचपन व मनुष्यता के गुण विलुप्त हो जाएंगे। इन्हें बचाने के लिए तो  'मनुष्य' बनना आवश्यक है। याने एक और परिवर्तन। उस दिन भी ' मनुष्यता ' विचार करेगी , 


दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई

काहे को दुनिया बनाई तूने काहे को दुनिया बनाई......

||9|| स्नेहा और गणित -दो

उसका नाम स्नेहा गुप्ता था। उसका पूरा व्यक्तित्व बेहद प्रभावित कर देने वाला था। उसके काले रेशमी बाल बेहद घने थे जो बड़ी मुश्किल से जबरन किसी ब...