Friday, 14 November 2025

||9|| स्नेहा और गणित -दो

उसका नाम स्नेहा गुप्ता था। उसका पूरा व्यक्तित्व बेहद प्रभावित कर देने वाला था। उसके काले रेशमी बाल बेहद घने थे जो बड़ी मुश्किल से जबरन किसी बैंड से बंधे होते। बाद में एक फिल्म 'कुछ कुछ होता है ' की नायिका रानी मुखर्जी के बाल उसके जैसे लगे।  हम दोनों स्नातक तक एक कक्षा में रहे, लेकिन वो हमारे मित्र समूह की सदस्य नहीं थी सो ज्यादा बात भी नहीं होती थी फिर वो स्मार्ट थी जो उसकी सुंदरता पर हावी था। कुल मिलाकर वह पसंद किए जाने योग्य थी लेकिन यदि उसके बारे में किसी ख़ास पहलू के बारे में मुझे नहीं मालूम , तो ये मेरी सूक्ष्म दृष्टि पर भारित उसकी विशेषता थी। लड़कियों की भी कई प्रजातियां होती हैं। इसलिए सुंदर व स्मार्ट होना दो भिन्न बाते हैं । मैं इन दोनों कैटगरी में नहीं आती थी और ये अच्छा भी रहा क्योंकि मैं उन दोनों प्रकारों में भेद कर पाने में सक्षम थी। लेकिन नेहा में दोनों बातें समाहित थी और उस समय के 'मॉडर्न' शब्द को प्रसारित करती थी। उस समय एक नए गीत का पदार्पण हुआ था "सेक्सी - सेक्सी लोग मुझे लोग बोले", जिसे गाने की हिम्मत किसी में न होती लेकिन एक नया शब्द प्रचलित हुआ था.."सेक्सी" , जिसका तात्कालिक रूप से सही सही शाब्दिक अर्थ बुरा ही था किन्तु आज के परिप्रेक्ष्य में इतना कहा जा सकता है कि स्नेहा में 'सेक्सी स्मार्टनेस' रही है।


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'मॉर्डन' लड़कियों के साथ रहने में बड़ी असहजता का अनुभव होता था जबकि सुंदर लड़कियों के साथ सहजता हो ही जाती थी। स्नेहा में इस दोगुने प्रभाव के कारण मेरी उससे ज़्यादा नजदीकी मित्रता नहीं रही। सुंदर लड़कियों व स्मार्ट या मॉर्डन लड़कियों को छोड़कर जो शेष जमात बचती थी उसमें मेरा भी नंबर आता था। हालाँकि मेरी और से सुंदर श्रेणी में सम्मिलित होने की चेष्टा होती रही लेकिन फिर भी मुझे उस श्रेणी का पायदान भी नहीं मिल सका। खैर वर्ष 1997 की बात थी । बोर्ड परीक्षा होनी थी। स्कूल की और से अनुभव हेतु अर्द्धवार्षिक परीक्षाएं आयोजित होती थी। ऐसे ही एक बार 'गणित-दो' का प्रश्न पत्र था। मेरे बगल में बाई वाली पंक्ति में स्नेहा शुरू से दूसरे नंबर पर बैठी थी। याने मैं अपनी पंक्ति में चौथे स्थान पर थी। नेहा से प्रश्न उत्तर संपर्क हेतु मुझे आगे देखना होता और उसे पीछे। पत्र में कुछ वैकल्पिक प्रश्न हुआ करते थे , जिसमे चार विकल्प होते थे। यदि किसी को किसी प्रश्न का उत्तर पूछना हो तो एक्जामिनरों की दृष्टि से बचते हुए 10 प्रश्नों तक आराम से 10 उंगलियों के प्रयोग करते हुए और चार उंगलियों से विकल्प का प्रयोग करके बात बन जाती थी फिर ये मासिक प्रश्न पत्र जैसा ही था। 


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अब स्नेहा ने ये जोखिम उठाया और मुझसे प्रश्न पूछा।

लड़कियों में नम्बर पाने के लिए जंग सी छिड़ी रहती थी या कहे ये सार्वभौमिक सत्य भी है, क्योंकि मैंने उच्चतर स्तर की परीक्षाओं में स्वयं ये अनुभव किया है। आधे-आधे नंबर पर लड़कियों के व्यक्तित्व में गर्व नामक ताज सज जाता है। जबकि लड़कों में ऐसे स्त्रियोचित लक्षण नगण्य होते हैं। अब स्नेहा तो पहले से ही बेहद अनमोल गुणों की स्वामिनी थी। और फिर विद्या के क्षेत्र में ही उससे प्रतिस्पर्था की जा सकती थी और ये अच्छा मौका भी था। स्नेहा ने अपने बगल से दाएं हाथ की चार उंगलियों को उठाया। मैंने उसे देखा। मुझे चौथे प्रश्न का विकल्प आता था।लेकिन मैंने उसको अनदेखा कर उसकी और अपने दोनों हाथों का प्रयोग करते हुए सात उंगलियां उठायी। स्नेहा ने मुझे मेरे प्रश्न के प्रत्युत्तर में दो उंगलियां उठाकर जवाब दिया। 


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गणित का प्रश्न पत्र बेहद कठिन था। मुझे तो इसका टाइटल भी पसंद नहीं था। 'गणित-दो'...मेरे जैसे लोग गणित को 'गणित-दो' कहते...यू0 पी0 बोर्ड में कितना जबरन अत्याचार था। जीवन मे जो प्रश्न आज आसानी से हल हो जाते हैं ,बचपन मे वो ही पहाड़ से दिखते थे। गणित में टिगनोमेट्री, बीजगणित/रेखागणित में पाइथागोरस,विज्ञान में लेमार्क और डार्विन के वाद के बीच लुई पॉश्चर का पाश्चुरीकृत दूध , फिजिक्स में न्यूटन और बॉयल जैसे नीरस लोग अपने अपने आधिपत्य का कब्ज़ा जमाये थे। वहीं कबीरदास जी हिंदी की किताब में घूमते व कहते..."कबीरा यहु संसार है जैसे सेमल फूल".....उस समय के बालमन में किताबों का ये विरोधाभास मेरी समझ से बाहर था। फिर भी कबीर की बातों से मैं सहमत थी। हिंदी की किताब के कबीर , सूर, तुलसी, रहीम, बिहारी सबके दोहे आदि पढ़ना ज़्यादा बेहतर लगता था। इससे भी विचित्र बात ये थी कि उस समय किताबो के लेखक मुख़ज़बानी याद रहते। रमेश गुप्ता, कौशिक, बाउंट्रा- खन्ना, अग्रवाल ...जाने कौन कौन। हम सबके दिमाग़ की कुछ मेमोरी में समाते रहे। अब ऐसी विकट परिस्थितियों में नेहा से ज्यादा अंक लाने की सोंच को ग़लत भी कैसे कहा जा सकता है? अब हैं तो हम रटंत विद्या को ग्रहण करने वाले लोग। फिर इसमें मेरा क्या दोष?


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स्नेहा मुझ पर एक दृष्टि बनाये हुए थी उसे आशा थी कि उसको मैं भी जवाब बताऊँगी। मैंने कक्षा के पर्यवेक्षक की और दो तीन बार देखा फिर अपनी कॉपी में देखा ताकि स्नेहा को ये लगे कि पर्यवेक्षक के कारण मुझे नेहा को बताने में असुविधा हो रही है। अंततः वो काफी पहले अपनी उत्तर पुस्तिका को पर्यवेक्षक को पकड़ा कक्षा से बाहर चली गयी। मैं घंटी बजने के भी बाद बाहर निकली और नेहा ने मुझे पकड़ लिया 

" तूने क्वेश्चन का आंसर क्यों नहीं बताया ?"

"बार-बार सर देख रहे थे..कैसे बताती" मैंने कहा।

ये ज्यादा बड़ा मुद्दा नहीं बना। फिर स्नेहा सचमुच नंबर पाने की मुरीद भी नहीं थी ..ये अधिक अंक लाने की लालसा वाला स्त्रियोचित गुण उसमें नहीं था। उसका आत्मविश्वास भी विलक्षण थ। उस समय वो प्रतिभा से युक्त किशोरी थी ।


स्नातक के दौरान एक बार हम दोनों अपनी एक मित्र पंकज की शादी में शामिल होने लक्ष्मण झूला गए। स्नेहा और मैं। ये मेरे लिए गौरव की बात थी कि इतनी काबिल लड़की , जिसका हर चीज़ में वर्चस्व है । मुझे उसके साथ जाना पड़ रहा है। पंकज बहुत अच्छी बातें करती। उसका प्रेम विवाह था। उसके हल्दी हाथ मे हमें कुछ पैसे मिले थे , शायद हमने कप प्लेट जैसा कोई गिफ्ट भी दिया था। ज़्यादा कुछ अब याद नहीं.... लेकिन अब मुझे लगता है कि स्नेहा की मुस्कुराहट और हंसी आज भी बहुत खूबसूरत है। कुछ समझदारी मुझमें आई होगी लेकिन वक़्त ने उसको भी कितना तराशा होगा......


#कतरा_कतरा_लम्हा_ज़िन्दगी


( बड़े ही इत्तेफ़ाक की बात है कि जैसे ही मैंने नेहा के बारे में लिखना प्रारम्भ किया वैसे ही जुकरबर्ग की कृपा से नेहा ने मुझे ढूंढा और तुरंत बातें की। मैं टेलीपैथी विज्ञान नहीं जानती लेकिन सच में यदि किसी को याद किया जाए तो संभव है कि वो भी आपको वहाँ याद करता हो।)

Thursday, 6 February 2025

||8|| बदलती सभ्यताएं और बदलता ' मनुष्य '


इतिहास बताता है सारी सभ्यताएं नदियों के किनारे बसती रही या कहा जाए कि जीवन पानी के किनारे ही समृद्ध होता है। आज भी भूगर्भवेत्ताओ को पहली नदी सभ्यता का प्रमाण रही सिंधु घाटी अपनी खंड- खंड हुई धरा के गर्भ में बड़े अन्न कोठार, स्नानागार, धर्म, नगर उत्कृष्टता, शिल्प आदि चीख- चीख कर अपना अस्तित्व बता रही है। इसी प्रकार मगध की समृद्धि अवशेष भी बिहार में विद्यमान है। लब्बोलुआब ये है कि सम्पन्नता एवं विपन्नता एक सिक्के के दो पहलू हैं। व्यक्ति, राष्ट्र, विचारधारा संबंधी विषयों पर भी कमोबेश एक सी ही संकल्पना  है। कहा जा सकता है कि व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य में सुख व दुःख की परिकल्पनाएं होती हैं। पुरातन नदी घाटी सभ्यताओं से होकर वर्तमान मानवमूल्यों तक पहुंचने में भी सदी ने बचपन से लेकर प्रौढता देखी है... बिलकुल मेरी और आपकी तरह। 


     शैशव अवस्था में बहुत सी बातों के प्रति हम उत्सुक रहते हैं। मैंने वो उत्सुकता महसूस की है। जानने की इच्छा स्वयं के अनुभवों से शनै- शनै मस्तिष्क में घर करती है। ये जीवन जीने के लिए अच्छा है। मुझे याद है मेरे घर से दिखते पहाड़ों पर जाने के लिए मैं रोज़ शाम को तैयार होती....अकेले भागती, किंतु पहाड़ कभी नज़दीक नहीं आया । ऐसे ही कई ओर बातें थी धरती का गोल होना , बादलों के रंग के नाम की लाल- नीली परियां सब कुछ अदभुत था। 


          चंद्रमा का मुख वैसा ही दिखता है जैसा बचपन में देखा था। वो वृद्ध नहीं हुआ आज भी वैसा ही शांत है। एक गीत"जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा" में नायिका चांद से उतरते दिखाई गई। दूरदर्शन के धारावाहिक में जब धरती कृष्ण मुख भीतर घूमी तो मेरा मन सहम गया। सब मेरी कल्पनाओं में हकीकत की तरह बसता गया। विज्ञान में अध्यापक हमें बताते कि हर चीज एक निश्चित अवधि में समाप्त हो जाएगी सूरज ,चांद ...सब कुछ। मुझे बड़ा कष्ट हुआ। घर आकर मैंने ये बात अपने भाई से कही। उसने कहा, जब तक आइंस्टाइन जैसे लोग रहेंगे धरती पर अंधेरा नही होगा। उसे सुनकर बड़ा सुकून मिला कि हम ठीक रहेंगे। 


            कुछ लोगों की लाशों को ले जाते देख किसी को कहते सुना ,"सभी लोगों ने ऐसे ही जाना है"।  इस बार फिर प्रश्न समाधान हेतु मेरे पास भाई का ही विकल्प था। उसने कहा, " हम बड़े होते है और काफी समय बाद खत्म होते हैं। गाँधी जी भी खत्म हुए, लेकिन वो पीढ़ियों तक जाने जाएंगे"। मुझे उसकी बातें बिलकुल पसंद नहीं आई। कोई मर जाए उसके बाद कुछ भी हो क्या फायदा। मैं रोज़ शीशा देखती। एक -एक दिवस गुजर रहा था। जीवन उन दिनों भी ऐसे ही वक्त के हाथों से फिसल रहा था। फिर एक दिन गौतम बुद्ध की कहानी पढ़ी। उन्होंने जो भी प्रश्न चेन्ना से किए उन प्रश्नों को मैं महसूस कर चुकी थी। वृद्ध होने फिर मर जाने से मुझे भय लगता था। इससे बड़ा क्या ज्ञान था ?  मैने सिद्धार्थ की तरह घर नहीं छोड़ा लेकिन बारह बरस एक पैर पर तपस्या वाली बात पर मुझे यकीन नहीं होता था , क्योंकि मात्र एक मिनट से कम अवधि पर मैं गिर जाती।


             स्कूल के अलावा ज्ञान अर्जन का दूसरा विकल्प नहीं था। अध्यापकों द्वारा बचपन से कल्पनाशीलता वाली कहानियों के साथ मौसम, ज्वालामुखी पढ़ाए गए। इस दोहराव से मेरे बहुत सारे ' क्यों ' का जवाब नहीं मिल पाता। इन सब बातों में मुझे सुनाई गई कहानियां के साथ विज्ञान की खोज का मिश्रण था। साधारण शब्दों में कहा जाए तो दिल को भाने वाली कहानियां और विज्ञान समझने वाला दिमाग मेरे साथ बढ़ रहे थे। यह बहुत मुश्किल था कि दिल को दिमाग से अलग किया जाता । यद्यपि कल्पनाशीलता की और मेरा झुकाव था किंतु स्कूल में पास होने की अनिवार्यता ने विज्ञान को मेरे दिमाग में स्थापित कर दिया। कितनी कमाल की बात है कि यदि हम प्रेम, दर्द व पीड़ा की बात करते हैं तो दिल शब्द का प्रयोग करते हैं और यदि किसी तर्क की बात करते हैं तो दिमाग का। जबकि यह संपूर्ण कार्य वैज्ञानिक रूप से दिमाग ही करता है।


             इतनी छोटी सी दुनिया में प्रत्येक मनुष्य विभिन्न प्रकार के संघर्षों को झेलकर आगे बढ़ता है। समाज में अपना स्थान बनाता है और अपनी उपलब्धियों से संतोष प्राप्त करता है ।मनुष्य जीवन में अपने- अपने प्रकार के आदर्श स्थापित है। उन आदर्शों के तहत वह आचरण करता है। मनुष्य के समाज में शासन करने के लिए भिन्न प्रकार की युक्तियां प्राचीन काल से क्रियान्वित है। राजा का काल हो या आधुनिक शासकों की बनाई गई व्यवस्थाएं। अच्छा- बुरा, सही- गलत सभी कुछ देश,काल अनुसार परिवर्तनशील रहा है। सूखी धरती हमेशा बांझ नहीं हो सकती। जर्जर,वीरान रेत पर भी कुछ हरे तने द्रुतगति से रूपांतरित होकर कांटे बन जाते है और एक दिन उन कांटो के बीच फूल भी दिखते है। 


            परिवर्तनशीलता जीवन का यथार्थ है। इसके बावजूद संस्कार, परहितवाद, सहयोग, सामजस्य,प्रेम आदि तत्वों से मनुष्यता साकार रूप लेती है। धन से सिर्फ मनुष्य अपनी इच्छाएं पूर्ण कर सकता है। सुख की परिकल्पना धनविहीन है। आज की स्थिति में हम सब आधुनिक जगत के मशीनी उपकरण हैं। जिस तरह इतिहास के पन्नों में नदी घाटी सभ्यताएं दफन है उसी प्रकार एक दिन बचपन व मनुष्यता के गुण विलुप्त हो जाएंगे। इन्हें बचाने के लिए तो  'मनुष्य' बनना आवश्यक है। याने एक और परिवर्तन। उस दिन भी ' मनुष्यता ' विचार करेगी , 


दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई

काहे को दुनिया बनाई तूने काहे को दुनिया बनाई......

Friday, 17 January 2025

||7|| जीवन- यात्रा के धूमिल पन्नों में लिपटी स्मृति


जीवन की बहुत सी उदास और शांत शामों में वो भी एक शाम थी। रेलगाड़ी की द्वितीय श्रेणी में कमबख्त एक खिड़की थी ,जो मुझसे बातें करना चाहती थी। हर बात को साफ़गोई से कहना चंचलता की निशानी है। चंचलता को अक्षुण्ण रहना चाहिए क्योंकि संसार की कठोरता में ये गुम हो जाती है। उस दिन चंचलता बाहर की दुनिया से विलग हो उस खिड़की से भाग जाना चाहती थी। शाम उस डब्बे में आस - पास कुछ बातों और ठहाकों का शोर था किंतु मेरी आंखें उस किनारे वाली खिड़की से वक्त का गुज़रना देख रही थी...खामोश सफ़र था लेकिन मन में हलचल थी। रेल के उस डब्बे में कोलाहल था मेरे साथ कॉलेज के अन्य लड़के व लड़कियां भी थी उनके अपने शौक़ थे और अपने दोस्त भी। उस सबमें मेरा दोस्त या दुश्मन कहलाने वाले कोई विशेषताएं भी नहीं थी। मेरी पसंद - नापसंद इतनी विचित्र थी कि उन सामान्य लोगों ने मुझे अकेला ही छोड़ दिया था। 

कोयंबटूर से दिल्ली के लिए हम सभी रवाना हुए थे। पिछली शाम मैं एटीएम से पैसे नहीं निकाल सकी थी । साथ में एक लंबी स्ट्रिंग वाला पर्स था जिसकी एक जेब में कुल जोड़ -जमा 100 रुपए थे।यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर भी डिब्बे में हमें देखने आ रहे थे। मैंने उन्हें देखते ही उनसे पूछा कि उनके पास कुछ 500 रुपए होगें? उन्होंने इस तरह बेहद तीक्ष्ण अंदाज़ में अपनी जेब की असमर्थता बताई कि मुझे स्वयं पर अफ़सोस हुआ। मेरी वर्तमान आयु उस वक्त उनकी आयु के समान रही होगी आज मै यह कह सकने में सक्षम हूं कि उस समय उनके द्वारा  किया गया व्यवहार सही नहीं था क्योंकि उनकी ज़िम्मेदारी सभी छात्र - छात्राओं की थी। मान्यता है कि कॉलेज में नौकरी करने वाले लोग हमेशा युवा बने रहते हैं। यदि ये परिस्थितिवश सत्य भी हो तो भी शैक्षिक डिग्री धारक प्रोफेसर को पुरुषप्रधान निर्मित युवा अपरिपक्व हंसी में प्रतिभाग कर स्त्री के प्रति कर्तव्यहीनता नहीं दर्शानी चाहिए। यूनिवर्सिटीज के टूर कार्यक्रमों में उत्तरदायित्वों के साथ मजबूरी रहती होगी कि लड़कियों के साथ एक महिला भी शामिल की जाए। हमारे साथ भी एक महिला थी। विडंबना ये थी कि उनके पति भी हमारे साथ थे। दक्खिन के पूरे टूर पर वह अपने पति से विभिन्न वस्तुओं की खरीदारी की ज़िद करती। हम लोग उनका रूठना- मनाना ही देखते रहते। शायद ही किसी  साथी लड़की ने उनसे कभी कोई शिकायत की होगी। कमोबेश टूर ठीक से पूर्ण हो चुका था और हम सब टूर को पूरा कर वापिस लौट रहे थे।


ट्रेन चल रही थी और तीसरी रात दिल्ली पहुंचना था। देखिए न, दुनिया की सारी बातें पैसों से शुरू होती हैं और पैसों पर ही अंत  हो जाती हैं। इन पैसों में दो दिनों तक गुज़ारा करना थोड़ा कठिन जान पड़ता था।  एकांत स्वयं को जानने का सबसे उपयुक्त साधन है।  आप स्वयं एकांत ढूंढ लें या फिर आपको एकांत के गर्त में डाल दिया जाए... दोनों ही मामलों में आत्मअनुभव प्राप्त होता है। खिड़की से हवा मुझे छूकर जगा रही थी और मेरी आंखों के आगे रात के अंधेरे में समय के चमकते हिस्से गुजर रहे थे।

 

उस दिन भूख नहीं लगी। बस शाम गुज़री और रात्रि के पहर अपनी बारी का इंतजार करते रहे। न जाने नींद कब आंखों में उतर आई। सुबह 4 बजे के आस- पास अपने पैरों के पास किसी के बैठने को महसूस किया । उस तरफ देखा तो 27 या 28 साल का कोई व्यक्ति था। उम्र में सटीक होना सिद्ध नहीं हो सकता किंतु उसके चेहरे में गंभीरता एवं स्वभाव में शिष्टता का अतिरेक था। वो सीट पर टिकने मात्र ही सधा था। उसमें असहजता थी। मैं उठकर बैठ गई और उसे ठीक से बैठने को कहा।उसके साथ कुछ केरल की लड़कियां भी उस डब्बे में आ गई थी। कुछेक अन्य लड़के भी थे। उन सबके पास टिकट की क्या स्थिति थी इस तरफ़ तो ध्यान ही नहीं गया। वो सारे लोग आपस में मित्र थे वो तमिल और मलयालम जैसी भाषाओं में बात कर रहे थे। मुझे बस तीव्र र एवं ट का उच्चारण ही अधिक सुनाई पड़ता। मलयाली लड़कियां बीच -बीच में मुझे मुस्कुराते हुए देखती । शायद वो मुझसे बात करना चाहती थी लेकिन भाषाई विच्छिन्नता हमारे बीच अंग्रेजी भाषा का सेतु निर्मित कर रही थी। इसी बीच मेरी सीट पर बैठे उस व्यक्ति ने बताया कि वो  तमिलनाडु से है और हिमाचल में सी0आई0डी0 में कार्यरत है। वो हिंदी समझ सकता था इसलिए कुछ देर के लिए वो मेरे और उन मलयाली लड़कियों के बीच ट्रांसलेटर बन गया था। इसी बीच उसने अपने गांव का नाम भी बताया और कहा कि वो अपने माता - पिता की इकलौती संतान है। कुछ घंटों के सफ़र के बाद उसने मेरे सहपाठियों को देखते हुए पूछा, " क्या ये आपके साथ है?"

"हां"

"ये आपसे बात क्यों नहीं करते?"

"ये तो उन्हें ही पता होगा लेकिन मैं भी उनसे बात नहीं करती।"

"टूर में तो सबको साथ में बोलना ही चाहिए।"

"जब ज़रूरत होगी तो बोलेंगे।"

"आपका नाम नहीं पूछा।"

"सीमा"


इसके बाद उसने मुझसे नाश्ता करने को पूछा। मैंने उसे मना कर दिया। फिर उसने उन सभी साथियों के साथ नाश्ता किया। उसके बाद वो वापिस मेरी सीट पर आकर मेरे साथ बात करने लगा। 


उस समय ट्रेन में कुछ लोकल सामान बेचने वाले आ जाते थे। एक महिला एक टोकरी लिए अंदर चली आई थी। उस टोकरी में हरे अमरूद थे। 10 रुपए में 5 अमरूद । अमरूद इतने कच्चे थे कि दांतों के साथ अधिक सख़्त हो टकराव की विशेषता रखते किंतु अन्य वस्तुओं की तुलना में ये सौदा सस्ता था। मैंने उसे 100 रुपए दिए उसने 90 रुपए वापिसी के साथ एक लिफ़ाफे में हरे अमरूद। वो व्यक्ति मेरे सामने ही बैठा था। बहुत देर तक तो अमरूद खाने की हिम्मत ही नहीं हुई क्योंकि वो इतने कच्चे हरे थे कि वो किसी को खाने के लिए देना ठीक नहीं लगा कुछ देर बाद मैंने उसके सामने ही वो अमरूद खा लिया। वो शायद मुझे देखता रहा । लगभग दोपहर के 12 बजे थे। इतने में किसी स्टेशन पर एक महिला एक बच्चे को गोद में लेकर बोगी के भीतर आ गई। उसने मेरे आगे खाने के लिए अपना हाथ फैला दिया। उसने पैसे भी मांगे होते तो मुझे देने ही पड़ जाते लेकिन उसने खाना मांगा। मैंने चारों अमरूद उसे दे दिए। पता नहीं ये कैसा फैसला था दिमाग़ अधिक प्रभावी था या फिर दिल... ये कहना मुश्किल है। हालांकि भूख में इंसान को सब खाने योग्य लगता है। अमरूद लेने के बाद वो महिला चली गई।


वो अभी भी साथ में ही बैठा था लेकिन दोपहर लगभग 2 बजे उसे उसके साथियों ने खाने को बुलाया। मैने अभी तक उसका नाम नहीं पूछा था। उसने मुझसे भी खाने के लिए कहा किंतु मैने उसे मना कर दिया। वो थोड़ी देर के लिए चला गया। मैं खिड़की के बाहर क्षितिज तक के खेतों को देखने में व्यस्त हो गई। मेरे साथ के टूर वाले एक दो लोग मुझे खाने के लिए पूछने आए किंतु उन्हें अपनी माली हालत बता सकूं ये अर्हता उनमें नहीं थी। मैं तो इंतज़ारी में थी कि कब 10 रुपए में आलू- पूरी वाले स्टेशन आएं तो शेष 80 रुपए पर्याप्त हो जाए। ऐसा सोच ही रही थी कि वो वापिस आ गया। इस बार ट्रेन में चाय वाला आया। उसने मुझसे पूछे बिना चाय वाले को दो चाय बनाने को कहा। मैंने तुरंत उससे कहा, "ये दूसरी चाय किसलिए? मैं चाय नहीं पीती।" फिर उसने एक चाय ली।


लौहपथगामिनी अपनी गति में छुक -छुक चल रही थी। दूर तक पसरी खामोशी के बीच उसने मुझसे पूछा, " आप कुछ खा लीजिए। "

इस बार मैंने उससे कहा "मेरे पास पैसे नहीं हैं। एटीएम से पैसे नहीं निकाल सकी। "

"मुझसे ले लीजिए। बाद में दे देना।" उसने कहा।

"नहीं...."


इस बीच उसने उसके सभी लोगों से कुछ बातें की। उस समय गूगल जैसी सुविधा हाथों में नहीं थी। नोकिया के फ़ोन यदा -कदा दिखने लगे थे। शाम 6 या 7 का समय था। उसने फिर कहना शुरू किया, " सुनिए, रात 1 बजे ट्रेन नागपुर स्टेशन पर रुकेगी। स्टेशन पर ही एटीएम है। वहां हम उतरकर पैसे निकाल लेंगे"। 

"ट्रेन छूट गई तो?"

" ट्रेन वहां 5 मिनट रुकती है। " उसने कहा।

उसके सारे दोस्त भी मुझे ही एकटक देख रहे थे। इसी बीच एक लड़की मलयालम और अंग्रेजी को मिलाकर बोली कि यदि ट्रेन चली तो वो सब ट्रेन रोक लेंगे। मुझे ये कुछ अस्थिर किंतु संतोषजनक बात लगी। 


रात 12 बजे बाद वो सभी लोग मेरे साथ स्टेशन का इंतजार करने लगे। इत्तेफाक की बात थी कि उस दिन ट्रेन नागपुर स्टेशन के थोड़ा पहले खड़ी हो गई, जिसे हम आउटर कहते हैं। उतरने एवं न उतरने की कशमकश में 5 मिनट तो ट्रेन के गेट पर ही व्यर्थ हो गए। लेकिन हम उतरे....पहले वो और उसके बाद मैं। हम लगभग भागते हुए अंधेरे में दूर चमकते स्टेशन की तरफ़ बढ़ने लगे। वहां पहुंचने तक तो मेरी सांस ही फूल गई। जैसे ही पहुंचे वैसे ही हमारे पीछे - पीछे ट्रेन भी पहुंच कर रुक गई। स्टेशन बाईं ओर था उसी में एसबीआई का एटीएम लगा था। मैं तुरंत उसमे जाने लगी तो वहां खड़े एक गार्ड ने कहा, "मैडम एटीएम खराब है"।

वो मेरे साथ ही था। उसने तुरंत गार्ड से पूछा," आस -पास कोई दूसरा है"?

" यहां से बाहर निकलकर 200- 300 मीटर पर पीएनबी का है"। गार्ड ने कहा।

उसने मुझसे कहा,"जल्दी आओ"।

हम दोनों ही स्टेशन से शहर की ओर बाहर भागते - भागते आए....एटीएम दौड़ने वाली सड़क की तरफ़ के दूसरी ओर दिखा। सड़क लगभग  35 फीट चौड़ी थी। इतनी रात भी वहां गाड़ियों की आवाजाही थी। 


सड़क पार करना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल काम ही रहा है। मुंबई की सड़के और लोकल का अनुभव ही मेरे लिए पर्याप्त था। मैंने तो ऋषिकेश की सड़कें भी अकेले बमुश्किल पार की हैं। जीवन में अक्सर ऐसा होता रहा कि कई ऐसी सड़कों पर मुझे पुलिस सड़क पार करवाती रही। कमोबेश अभी भी ऐसा हो जाता है। इतने लंबे समय को पार करने के बाद भी एक सड़क पार करना मेरे लिए मुश्किल हो जाता है। इस समय भी ये बात सही है, उस समय भी सत्य ही थी। वो तो चलती गाड़ियों के बीच से सड़क पार हो गया। मैं अवाक होकर इस पार ही रह गई। वो उधर सड़क के दूसरी ओर से मुझे बुला रहा था। गाडियां चल रही थी। मैं जैसे ही पैर बढ़ाती गाडियां सामने आ जाती। पता नहीं उसने क्या सोचा लेकिन वो तेजी से वापिस मेरी तरफ़ आया। तुरंत अपने बाएं हाथ से मेरी दाईं कलाई को कस कर पकड़ा और लगभग दौड़ाते हुए गाडियां रुकवाकर सड़क पार कराई। मैं एटीएम पहुंची और एटीएम से 5000 रुपए निकाल लिए। ट्रेन की सीटी सुनाई दी थी । भागते -भागते गला सूख गया था। स्टेशन पहुंचे तो ट्रेन चलने लगी थी । हमारा डिब्बा पीछे से आगे आया । उसके सारे साथी ट्रेन के गेट पर खड़े थे। डिब्बा सामने आने पर उन्होंने उसका हाथ पकड़ कर खींच लिया और फिर मुझे भी। 


उन सब लोगों ने मिलकर मेरी मदद की थी। मेरा खाना न खाना उन सबने देखा था। उस समय वो सब लोग मुझसे अधिक खुश थे। सबने मुझे घेरा हुआ था। मेरे साथ के लोगों को तो कुछ ख़बर ही नहीं थी। इसी बीच वो मेरे पास आया। उसके हाथ में बड़े ग्लास में कोकाकोला और एक ब्रेड पकोड़ा का पैकेट था। मुझे ज़बरन थमाते ही उसने कहा," पैसे बाद में दे देना, ये ले लो"। इस बार मुझे उसकी बात माननी पड़ी। मैं वाकई में थक चुकी थी। गला मरुस्थल बन गया था। जिस खुद्दारी से मैंने उसकी चाय भी नहीं पी थी अब उसका ही खाने का अहसान मुझ पर चढ़ गया था। उसके बाद मैने पहली बार उससे बात की। उसका नाम भी पूछा....शायद वेंकटेश था। एक गृहशोभा या यामा जैसी किताब मेरे पास थी उसी में कहीं उसने अपना पता लिखा था और अपने ऑफिस का नंबर भी दिया था। जाने किस असमंजस में मैंने उसे अपना पता नहीं दिया । मैंने ही उससे एक -आध बार बात की थी।


जीवन के कई चीजों को सहेजकर रखने की आदत के बावजूद वो किताब नहीं मिल पाई। उस समय की कुछ शेष किताबें मेरे साथ ही चल रही हैं। आज भी बड़ी उम्मीद से हजारों बार उन्हें पलटकर देखती हूं लेकिन वो पता नहीं मिलता। जीवन में कुछ लोग अनायास निस्वार्थ भाव से आपके जीवन में आते हैं और फिर बिन आहट गुम भी हो जाते है। दिल्ली स्टेशन पर हम सब उतरे फिर अपने -अपने जीवन के लक्ष्यों की तरफ़ मुड़ गए। ऐसा लगता है कि उसकी स्मृति में मेरा अक्स रेल वाली लड़की जैसा छपा होगा। बावजूद इसके मुझे तमिल नहीं आती और उसे मेरा पता नहीं मालूम। अब ढूंढे तो ढूंढे कहां.....ये हम दोनों की समस्या बन गई और हम एक दूसरे के लिए विलुप्तप्राय हो गए।

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Saturday, 16 November 2024

|| 6 || टिक- टिक करती तीन घड़ियां

बचपन से समय को हाथ में पहनने की ख्वाहिश थी। ग्यारहवीं कक्षा की बात है। माँ ने कहा था कि यदि यू 0पी 0 बोर्ड में फर्स्ट डिविजन आई तो वह मेरे लिए एक घड़ी मंगवा देगी। याने घड़ी के लिए समय का इंतज़ार तो था ही और शर्त भी थोड़ी कठिन थी। मन तो चाहता था कि पहले मेरी माँ इतनी कठिन किताबें पढ़ के तो देखे....लेकिन मरता क्या न करता? अन्य लड़कियों के हाथों की घड़ियाँ देखते -देखते मन कुढ़ता लेकिन टाइटन की घड़ी को पहनने के शौक़ में पढ़ाई में बहुत मेहनत की। उस समय टाइटन की घड़ी के सूक्ष्म चलचित्र दूरदर्शन पर चलते थे। इसके अलावा कोई ब्रांड नहीं सुना सिवाय इस कथन के कि स्विस घड़ियां दुनिया की सबसे बेहतर घड़ियां हैं। अब ये भी कहा जा सकता है कि मेरी जानकारी ही सीमित रही हो क्योंकि उस समय मेरे साथ की लड़कियों के घर में केवल वाले कनेक्शन थे और मेरे यहां दूरदर्शन।


अब बारहवीं की बोर्ड परीक्षा खत्म हुई। कई स्याह पन्नों में मेरे संभावित प्राप्त अंकों के जोड़ कबाड़ में बदल रहे थे। ऐसे ही पन्नों को भरते हुए समय गुज़रता। कुछ दिन आपके जीवन में बेहद खास होते हैं इसलिए बहुत कुछ याद रह जाता है। हम सरकारी प्रांगण में रहते थे। पशुपालन विभाग की नाइट्रोजन उत्पादन यूनिट का विशाल मुख्य गेट था। वह आसमानी से रंग का था। कुछ वक़्त पहले तक भी वह आसमानी रंग में ही था। मेरे बचपन की दिनों में ये इतना विशाल होता था कि इसी पर हम सारे बच्चे बारी - बारी से झूलते ....और तब तक झूलते जब तक कोई खूंखार आवाज़ हमें न भगाती। उस मुख्य गेट के बाहर पुलिया है जिस पर दोनों और सीमेंट की बेंचनुमा संरचनाएं हैं। पुलिया पर बैठकर आप सड़क में आने -जाने वाले लोगों को देखते हैं। 1999 में 20 जून के बाद की कोई तारीख़ रही होगी मै उसी पुलिया पर बैठी थी। उन दिनों रिज़ल्ट अख़बार में आता था। मुहल्ले का एक लड़का अख़बार लेने गया था। रिजल्ट वाले दिन अख़बार का मिलना भी मुश्किल होता और उसके दाम भी बढ़ जाते। ख़ैर दिल अपनी धड़कनों के ऐसे फेर में था कि हाथों के पोर ठंडे हो रहे थे। अचानक वहां मोहल्ले का वो लड़का साइकिल में अख़बार लेकर आया। उसने मुझे देखते ही कह दिया, ' आपका रोल नंबर नहीं मिला।'

' झूठ...' मेरी मुखमुद्रा बदलने से पहले ही वो कहने लगा 'फर्स्ट डिविजन '

' लाओ मुझे दो अख़बार '

'दूसरे लोगों को भी बताना है ' उसने कहा।

' मैं उसके हाथ से अख़बार छीन भाग गई। ' ये मेरे जीवन का सबसे ख़ास दिन था जिसे मैंने अपनी मेहनत से प्राप्त किया था। ख़ुशी दोहरी थी क्योंकि अब वक़्त को घड़ी के रूप में बंधना था। ड्रेस से मुक्ति मिली थी। रंग वाले कपड़े पहन कॉलेज जाना था। हां बस एक ही कठिनाई शेष थी कि डॉक्टर बनने की कुछ परीक्षाएं देनी थी।


दूरदर्शन के विज्ञापन में दिखाई जाने वाली घड़ी सुनहरी चेन के साथ होती इसलिए मैंने भी कल्पना की थी। मेरे मामा आर्मी कैंटीन से सोनाटा की घड़ी लाए जिसमें काले रंग का फीता था। कैंटीन में इसके लिए लगभग 1200 रुपए चुकाए गए थे। जब मैंने इस घड़ी को देखा तो मेरी कल्पना तार -तार हो गई लेकिन कुछ नहीं से कुछ अच्छा बेहतर होता है। मामा उसे बदलवाने दोबारा तो जाते नहीं और फिर ये मेरे जीवन की पहली घड़ी भी तो थी। कुछ अच्छा करूंगी तो शायद इससे अच्छी भी मिल जाए। बेमन से ही सही लेकिन अपने बाएं हाथ में मैंने उस फीते को बांधा। उस घड़ी के साथ कुछ समय बीता और मेरा एक विश्वविद्यालय में दाख़िला हो गया। उस विश्वविद्यालय में काफ़ी कॉलेज थे। कतिपय समकालीन कारणों से अच्छा रैंक आने पर भी मुझे वहां भी मनचाहा कॉलेज न मिल सका। यहां पर दुनिया के प्रपंच देख मेरा मन बिलख -बिलख कर रोने लगा। मुझे अच्छी तरह याद है कि उस रात कष्ट मेरी आंखों से बह रहा था। बड़े भाई ने मुझे बच्चों की तरह संभाला उसने मुझे कलाम साहब के बारे में बताया और उनके इच्छित जगह पर चयनित न होने पर उनकी देहरादून से ऋषिकेश की पैदल यात्रा के बारे में बताया। उनकी इस थकावट पर किसी बाबा ने उनसे कहा , ' ये तो बहुत छोटी जगह है, तुझे तो बहुत दूर जाना है।' मैं ये कहानियां सुन रही थी। आंसू नहीं थम रहे थे। मेरे भाई ने मेरे घड़ी वाले बाएं हाथ को घंटों पकड़े रखा और देर रात तक हम दोनों उस परिसर की सड़कों पर हाथ थामे घूमते रहे। बहुत सारे लोग काउंसलिंग के लिए आए थे इसलिए उस रोज़ रात जिंदा थी लेकिन मेरा मन गलत नीति मानने के लिए कतई तैयार नहीं था। मेरे भाई को भी सब मालूम था बावजूद इसके वो नहीं चाहता था कि मैं हार जाऊं। मेरे लिए उस दिन की जीत किसी काम की नहीं थी। अंततः दाखिले के बाद मैं वहां रहने लगी।


विश्वविद्यालय में अभियंत्रण कॉलेज का एक लड़का था, जो एक ज़माने में मेरी सहेली को पसंद करता था। उसका नाम विशाल था। वो मुझे वहां मिल गया। वो मेरे ही शहर का लड़का था। हम कभी- कभार सप्ताह में चाय साथ में पी लिया करते थे। उसकी टेक्निकल बातें मेरी समझ से दूर थी लेकिन फिर भी उस अंजान जगह में उसका होना मुझे तसल्ली देता था। एक दिन उसने कहा कि वो कॉलेज की तरफ़ से एक महीने के लिए मुंबई जा रहा है। मैने कहा, 'अरे वाह । बहुत घूमना '। 

उसने मुझसे पूछा, 'तुम्हें कुछ चाहिए?'

' नहीं, कुछ नहीं।'

वो महीने भर बाद वापिस आया। उसने मुझसे आँखें बंद करने को कहा। इसके बाद मेरे टेबल के ऊपर रखे बाएं हाथ में काले रंग की चैन वाली एक घड़ी बांध दी। मुझे घड़ी का आभास हुआ। आँखें खोलने पर मैने उसके दाम पूछे। उसने कहा, 'मन के उपहारों के मूल्य नहीं होते।' ये मेरे जीवन की दूसरी घड़ी थी। ये अचरज की बात है कि एक लड़के से कोई उपहार घड़ी ही मिली।


फिर समय बीता। एक नोकरी लग गई तो एक घड़ी खरीदी। अब दूरदर्शन से बहुत आगे का ज़माना आ चुका था लेकिन मेरी टाइटन लिखे डॉयल की घड़ी उस दिन वहां नहीं मिली । उस दिन अपनी कमाई से पहली घड़ी ली। ये घड़ी भी सोनाटा की थी। ये मात्र 2000 रुपए की थी। एक दिन ये बाज़ार में कहीं खो गई। उसके बाद फिर एक अन्य सोनाटा घड़ी 3000 रुपए की खरीदी। माने सोनाटा ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा।


मेरे भाई के हाथ में भी एक घड़ी थी। वो पुलिया, जिसका ज़िक्र शुरू में किया है। उसी पुलिया पर उसका एक्सीडेंट हुआ। फर्स्ट आने की खुशी भी इसी जगह पर मिली और ज़िंदगी का सबसे बड़ा दुःख भी इसी स्थान पर हमेशा के लिए चिरस्थाई हो गया। कुछ समय पहले उस पुलिया को देखा था। आज भी उस एक्सीडेंट की दरार दिखाई देती है। उसी हादसे ने मेरे भाई और उसकी घड़ी की धड़कन को बंद कर दिया। वो तो नहीं है लेकिन उसके हाथों से छुआ नोट, उसके कपड़े और वो घड़ी मैंने रख ली। उस घड़ी को बड़ी मुश्किल से ठीक कराया। जब उसकी धड़कन मेरे बाएं हाथ में वापिस धड़की तो लगा वक़्त वापिस आ गया है। मुझे तो बहुत सारा सुकून उन चीज़ों से मिलता है जिन्हें लोग निर्जीव कहते हैं। 


फिर एक बहुत लंबे वक्त के बाद टाइटन वाली दुकान पर गई। एक विदेशी घड़ी पसंद आई। मेरे मुताबिक बहुत महंगी थी। मैं वहां अक्सर जाती इस उम्मीद में कि क्या पता कोई ऑफर ही आ जाए। लेकिन दो साल तक भी वो घड़ी ऑनलाइन या ऑफलाइन उतने ही दामों पर टिकी रही। ये बात मेरे जीवन के सबसे बेहतर आदमी को मालूम हो गई और ये घड़ी मेरे जन्मदिन पर उपहार में मिल गई। मैं सोचती हूं हर दशक में आदमी के विचार एवं व्यक्तित्व में परिवर्तन आता है। मेरे बाएं हाथ के लिए अब तीन घड़ियां हैं। एक मेरी कमाई की, एक मेरे भाई की और एक उस बेहतर आदमी की। तीनों की अपनी कीमत है। काश मेरे जीने तक तीनों की धड़कने मेरे दिल से आती हुई बाएं हाथ की धड़कन के साथ मिलकर टिक -टिक करती रहे। अब टाइटन लिखे डॉयल में समय को बांधने की इच्छा शेष नहीं । जो समय शेष है वो इन घड़ियों के साथ बीते।

Wednesday, 16 June 2021

5. || विज्ञान व धर्म को खोजता बचपन ||


 ज़िन्दगी का मज़ा तब ज़्यादा आता है जब दिलों में मौसम अपना अहसास छोड़ जाते हों, फूलों की महक मिट्टी की सौंधी खुशबू से अलग महसूस होती हो। हमारे बचपन के बहुत से साल होते हैं जिसमें बरसात के छिछले पानी में कागज़ से बनी नाव बिन डूबे दूर तलक जाती थी। उस वक़्त कागज़ की नाव बनाने के कारीगरी मुहल्ले के कुछ बच्चों के हाथों में थी, जो अपनी इस तकनीकी विधा के एकमात्र पुरोधा थे। मुझे काफी दिनों बाद नाव बनाना आया । बहुत जल्द फेंकी हुई नाव को सुखाकर उसके मोड़ देख मैंने भी उसे बनाना सीख लिया। 


कागज़ की किश्ती पानी में दौड़ती थी और शुरुवाती बरसात में काले रंग की डंक वाली चींटियां घर के अंदर, कभी चौखट पर कभी ज़मीन पर। कुछ दिनों में उनके पंख निकल जाते। दिमाग़ अक्सर मनन करता कि कागज़ की कश्ती पतवार बिना पानी के सहारे भीग कर दूर निकल जाती थी और चींटी अपने नए पंखों से क्यों नहीं उड़ पाती थी।


धर्म में भक्ति व पूजन भारतीय समाज का अभिन्न अंग रहा है। मुझे भी बड़े लोग बताते कि पृथ्वी कृष्ण के मुख के भीतर है। गैलीलियो से पहले के वैज्ञानिकों की खोज धर्म के आगे   नेस्तनाबूत हो जाती है। कृष्ण के मुख के आकार की कल्पना से पहले पृथ्वी शब्द लिखने में मैंने कई बार गलतियां की। एक दिन एक सरदार अंकल हमारे घर आए। उन्होंने मेरी कॉपी उठायी और कहा,

" बहुत सोणी राइटिंग है पर ये पृथ्वी ग़लत लिखा है।"

उन्होंने पेंसिल उठायी व मेरे कागज़ में लिखे गए प्रथ्वी का र का हाथ पकड़कर प के नीचे बैठा दिया। और कहने लगे,

" ऋ की मात्रा होती है इसमें "

मात्राओं की भयावहता को मैंने प्रथम बार महसूस किया । 


टेलीविजन के परंपरावादी धारावाहिकों में भगवान विष्णु के कृष्ण अवतार की कल्पना अधिक प्रबल थी। उसमें यशोदा माता कृष्ण के मुख के भीतर घूमती पृथ्वी सहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड देखकर बेहोश हो गयी थी। बड़े लोगों द्वारा अक्सर धर्म के प्रश्नों को बालमन के अंतस तक उतारने के लिए कई नए मिथक गढ़ दिए जाते। धर्म के बारे में हम दोनों भाई - बहन बातें करते। 

एक दिन मैंने उससे पूछा 

"कृष्ण का आकार कितना बड़ा होगा?"

" हम कल्पना नहीं कर सकते । पता नहीं ... शायद हो भी।" उसने कहा।


" वो राजा बलि वाली कहानी भी समझ नहीं आयी। वामन अवतार का इतना बड़ा पैर कैसे हो सकता है ।" मैंने कहा।


" कहानियां बनायी हुई हैं। काफी सदियों बाद कई लोग भगवान बन जाते हैं।" उसने कहा।


" तो फिर किताबों में पृथ्वी को सूरज के चारों और घूमते क्यों दिखाते हैं। कृष्ण का मुँह क्यों नहीं दिखाते? " मैंने कहा।


" कहानियाँ अलग होती है। हमारे देश में पत्थर भी पूजे जाते हैं इसलिए धर्म को मानते हैं, विज्ञान अलग होता है।" उसने कहा।


इन बातों से मुझे कोई खास उपलब्धि नहीं हुई। एक दिन किताब में गौतम बुद्ध की कहानी पढ़ी। उसमें सबसे बुरा अनुभव देने वाला अंश शवयात्रा का था। उसके बाद रोज नए प्रश्न मुझे घेरते। कई दिनों तक मैं सोचती कि " मैं कौन हूँ? मुझे मेरा नाम क्यों पता है... मुझे क्या करना है। ये वाणी कहाँ से आती है । जब मरना ही है तो फिर जीना ही क्यों है?" 


 जीवन के नए साक्षात्कार यादों का हिस्सा बनने के लिए तैयार थे। पृथ्वी के बाद अब सूरज की बारी थी। वो एक दिशा से निकलता दूसरी दिशा में छिपता। एक "चार दिशाएँ " नाम की कविता किताब में होती। जिसके निम्न बोल होते-


"उगता सूरज जिधर सामने

उधर खड़े हो मुँह करके तुम

ठीक सामने पूरब होता

और पीठ पीछे है पश्चिम


बायीं और दिशा उत्तर की

दायीं और तुम्हारे दक्षिण

चार दिशाएँ होती हैं यों

पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण ।"


उस समय ये बेहद कठिन काम था कि दाई-बाई दिशा किस हाथ पर होगी। लेकिन अंततः 'द' से दाहिना व दक्खिन का मेल करके ये याद किया गया। सूरज के लाल -पीले होने का कारण भी कोई नहीं बताता था। मेरे साथ के बच्चे मेरी तरह बात नहीं करते थे। उन्हें किसी तरह की जिज्ञासा नहीं होती। अक्सर मेरे प्रश्न मेरे मन से जवाब माँगते। घर के आँगन में खड़े होने पर मैंने सूर्य को कई बार देखा । अक्सर लोग सूर्य को जल चढ़ाते। सूर्य की पहचान ग्रह व देव के बीच दुविधा में रह जाती। वो शाम को ज़मीन के नीचे छिप जाता। एक दिन मैंने उस बड़े फार्म में दूर तक दौड़ लगाई लेकिन मैं जितना आगे जाती धरती का किनारा मेरे हाथ नहीं आया। 

पाँचवी क्लास में यादव सर ब्लैकबोर्ड की और मुख करके पृथ्वी का चित्र बनाते हुए बोले, 

"पृथ्वी अपनी धुरी पर घूर्णन करती है..."

इससे पहले कि वो कुछ आगे कहते, मैंने तपाक से पूछ लिया, 

" लेकिन ये हिलती क्यों नहीं? हम सब कोनों पर गिरते क्यों नहीं?"

" ह्म्म्म, क्योंकि पृथ्वी में बहुत बड़ा चुंबक है जो सबको पकड़कर रखता है और गिरने नहीं देता। इस चुम्बक के कारण पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण उत्पन्न होता है। इससे घूमने का मालूम नहीं चलता ।" उन्होंने कहा।

"लेकिन...." 

"वो सब हम बड़ी क्लास में पढ़ेंगे।" उन्होंने कहा।

न मुझे कृष्ण के मुख का आकार मालूम हुआ और न ही गुरुत्व का ये चुम्बक। सूरज की कहानी अलग चलती थी। उधर कविता व यथार्थ में चाँद का झिंगोला भी घट-बढ़ रहा था। मैं चाँद में सूत कातती बुढ़िया को देखना चाहती लेकिन मुझे हमेशा एक चेहरा उसमें नज़र आता जो कभी उदास होता और कभी मुस्कुराता।


Saturday, 12 June 2021

4.स्कूल के बैंच की महानायिका

  वो एक छोटा सा स्कूल था नाम था "अरुंधति शिक्षा सदन"। स्कूल चाहर दीवारी के भीतर था। जिसके अंदर कोने में एक चाँदनी का छोटा पेड़ था । रोज़ सुबह उस पेड़ के नीचे सफेद चादर से बिछे फूलों को उठाकर दूबघास में पिरोकर मैडम को कई बार कई हाथों से दिया जाता। ये परंपरा विख्यात थी। स्कूल के बगल में एक हनुमान मंदिर था जिसमें एक पुजारी जी रहा करते थे। गहरी रंगत, तीव्र काली दृष्टि, दाढ़ी मूछों के साथ पैरों तक की केश राशि, जो कई घूमरदार लटों में बंटी थी गोया कई साँप एक जगह सिमट आये हों। उनमें स्फूर्ति कुछ अधिक थी। उसी मंदिर के अहाते में बनी सीमेंट की सीट पर हम लोग बैठकर खाना खाते और वहीं के नल से पानी पीते।बहुत बार पुजारी जी भी मुठ्ठी भर भर प्रसाद देते। उनसे भी लगाव रहता था। सतीश शर्मा स्कूल के प्रधानाचार्य थे। उनका पेट काफी बाहर निकला हुआ था जिस कारण उनको 'मोटू सर' कहना ज़्यादा सुलभ था। बचपन में कई नाम पता नहीं होते इस कारण शारीरिक आकृति से अध्यापकों का नाम लिया जाना कोई विचित्र बात भी नहीं होती। कुछ बच्चे तो पीली व नीली साड़ी वाली मैडम को अपनी नन्हीं भाषा में प्रयोग करते।

            कोई कक्षा चार या पाँच की बात रही होगी।कक्षा में लकड़ी की लम्बी-लंबी बेंचे होती थी। बैठने वाली बेंच और बस्ते रखने वाली बेंच। कक्षा में लड़के -लड़कियाँ थे। मुझे याद है कि हमारी एक बेंच पर पाँच लड़कियाँ बैठती थी। दीवार की तरफ मैं बैठती थी और बाहर की और लीलावती, बीच मे रश्मि , अज़मत और सुनीता रहते थे। ये क्रम कुछ कक्षाओं तक यथावत बना रहा इसलिए अभी भी याद है। उस वक़्त रश्मि मेरी पक्की सहेली थी और अज़मत और सुनीता पक्के मित्र थे। ये जीवन के आरंभिक दिवस थे जिसमें मुझे न हिन्दू- मुस्लिम का अंतर मालूम था और न ही जातियों के उपबंध। बालमन ने पक्के मित्र की क्या परिभाषा गढ़ी होगी मालूम नहीं। साथ अधिक बातें करने वाला पक्के मित्र को परिभाषित करता हो। ये बेहद कोमल मनो की सच्ची मित्रता की उम्र है जिस पर शायद ही किसी को अफ़सोस हो। 

उस समय बस्ते हुआ करते थे और बैग की जगह बस्ता शब्द ही साधारण बोलचाल की भाषा में प्रचलित था....बैग  शब्द तो भूमंडलीकरण के बाद की भाषा का हिस्सा बना । उस वक़्त बच्चों में बस्ते के प्रति बड़ा लगाव रहता था । हर बच्चे को जुलाई माह में स्कूल खुलने पर नए बस्ते की उम्मीद होती हालाँकि नये बस्ते की आमद पुराने बस्ते की शेल्फ लाइफ पर निर्भर रहती या फिर परिवार की आय पर। भूरे रंग के बांस पेपर या फिर अखबार की जिल्द नई किताबों पर चढ़ाई जाती। गोंद की बोतल व आटे की लेई से किनारे चिपकाए जाते। बस्ते के अंदर दो तरफ कॉपी किताबें लगती थी और बीच मे पेंसिल बॉक्स को रखने की परिपाटी लोकप्रिय थी। पूरे साल भर किताबो की रौनक फीकी नही पडती थी। वापिस बैंच की अवस्थिति पर आती हूँ। उस डेस्क- बैंच पर पाँच लड़कियों के बस्ते सही से नहीं आ पाते थे। मैं सबसे अंदर की और बैठती थी जिस कारण मेरे बस्ते को रखने में परेशानी होती थी। 

               बैंच की महानायिका लीलावती एक मज़बूत लड़की थी उस समय तो उसकी लंबाई चौड़ाई मात्र से ही हम सब भयभीत रहते थे। शायद उसकी उम्र भी थोड़ी ज़्यादा रही होगी, जो भी था उसका भय तो था ही। लीलावती के खौफ़ के कारण मुझे बस्ते को दीवार के सहारे खड़ा रखना होता था। रश्मि से दोस्ती इतनी गहरी थी कि एक दिन अदल-बदल के बारी बारी से हम दोनों के बस्ते को खड़ा रखा जाता। अज़मत, सुनीता व लीलावती के बस्ते हमेशा बेंचों पर आराम करते रहे ठीक वातानुकूलित उच्च श्रेणी के रेल डब्बों की तरह....और हम दोनों द्वितीय श्रेणी में आर ए सी पर समायोजित हुए, जिनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं होने वाला था । उस बैंच पर शोषित कन्या मैं ही थी। लीलावती बैंच की सारी लड़कियों से मतलब भर की बात करती। उसको हमसे बात करने की कोई आवश्यकता भी नहीं थी। वो क्लास की मॉनिटर थी । सच बात तो ये थी कि नापसंद होने पर भी हममें से कोई लड़की उसे बैंच से बेदखल करने का सोच भी नहीं सकती थी ।

              हम चारों लड़कियाँ साथ में दो - दो के जोड़े में रहा करती। हम चारों टिफ़िन साथ खाते । अज़मत का एल्युमिनियम का टिफ़िन था जिसके अंदर एक ओर एल्युमिनियम की डिबिया थी जिसमें अचार की महक बन्द होती । वो बेचारा टिफ़िन इसलिए याद है क्योंकि कुछ साल वो लगातार अपने अंदर पराँठे व अचार समेटे आता रहा। उस वक़्त अचार की परंपरा प्रचलन में थी । कई किलो आम गंडासे से क़त्ल होकर मर्तबानों में डाले जाते। कुछ समय बाद उनकी महक क़ातिल के घर का पता देती थी। बाजार में 'निलोन्स' के अचार आते थे। अधिकतर अस्सी के दशक तक बच्चों के टिफ़िन आम के अचार से लबरेज़ रहे है इसलिए मेरी भी रगो में वो खटास बाकी बची है। बच्चे कुछ बातें डराने के लिए करते हैं। अज़मत इस विधा में सिद्धहस्त थी। एक बार प्रधानाचार्य , जिन्हें हम लोग 'बड़े सर' कहते थे । एक दिन मैंने अपनी बैंच चौकड़ी के सामने गलती से उनको 'मोटू सर'  कह दिया...बस उसके बाद अज़मत ने कई बार छोटी-छोटी बातों पर मैडम को मेरी बात बताने की धमकी दी। उस स्कूल से दूसरे स्कूल में जाने तक अज़मत के बोल हर दिन दिल को आतंकित करते रहे।

                  एक बात और थी अज़मत में, वो बाएं हाथ से लिखती थी । उसका लेख बहुत खूबसूरत था। सुगठित मोतियों जैसा। इतना अच्छा लेख मैंने बहुत कम लोगों का देखा है । मेरी दाएं हाथ की उँगलियाँ आज भी अज़मत की उस उम्र के लेख का मुकाबला नहीं कर सकती। आज ध्यान देती हूँ तो लगता है कि सबसे खूबसूरत भी वो ही थी लेकिन उस समय रश्मि मेरे ज्यादा करीबी सहेली थी। उसका लेख अज़मत की तरह विलक्षण तो नहीं था लेकिन काफी अच्छा था। अब जब इन दो लड़कियों की तारीफ़ लिख रही हूँ तो इतना भी सत्य है कि उस वक़्त मेरा लेख काफी  बुरा था। सबको लाल पेन से गुड , वेरी गुड आदि मिलते। रहीम दास ने कहीं लिखा है स्वाति नक्षत्र की बूँद के बारे में ...किन्तु ये बूँद सिर्फ तीन जगह ही परिवर्तित होती है धोखे से भी कहीं और नहीं गिरती इसी प्रकार मुझे भी "इमला" के कुछ शब्दों में भी अपने बल बूते पर गुड की प्राप्ति नही हो सकी। लाल पेन से गुड पाने की बुलंद तमन्ना मेरी भी थी। गुड की संख्या ज्यादा होने पर गर्व जो हुआ करता था। रश्मि ने कई बार रबड़ से मेरी कॉपी का काम मिटाकर अपनी राइटिंग में काम किया। इमला बोलकर जब तक मैडम दूसरों की कॉपी चेक करती तब तक रश्मि मेरी कॉपी में काम कर देती थी। फिर मुझे सिर्फ उन्हीं पन्नों पर इस गुड रूपी अमृत की प्राप्ति हुई।

                रश्मि मेरे जीवन की पहली सहेली थी उसके बाल घुँघराले लंबे थे, जो हमेशा दो चोटियों में बँधे रहते। बोलते समय उसके मुँह से कभी कभार थूक भी निकल पड़ता। अब उस समय ये सब नहीं तौला था मन ने। आज भी ये आलोचना नहीं है याद है मेरी सबसे पहली सहेली की। सुनीता एक सीधी सी लड़की थी। मितभाषी । उसके कान में अक्सर रुई लगी होती। उसे कानों की कोई तकलीफ़ थी । उससे मेरी ज्यादा बात नहीं होती थी । लीलावती दिखने ज़्यादा खूबसूरत नहीं थी। उसका प्रभाव इतना नकारात्मक था कि उसके लिए आज भी कोई शब्द नहीं मिलता , जो उसकी छवि में कोई सुधार कर सके। लीलावती जहाँ कहीं भी हो मुझे मुआफ़ करे। एक दिन लीलावती की अनुपस्थिति में उसकी कॉपियों के गुड , वेरी गुड आदि गिनने के अतिरिक्त हम लोग उसका कोई अहित नहीं कर सके थे। 



                        

Saturday, 29 May 2021

3. स्कूल का पहला दिन


    बचपन का संग...उसकी अमिट यादें बड़ी गहरी होती हैं।जाने दिमाग़ के हिस्सों में क्या-क्या समाता होगा। यादें मरती नहीं, तभी तो मन याद करता है।  मन के द्वारा समेटी हुई यादें, अच्छी या बुरी, चाहे जैसी भी हों, कीमती दौलत की तरह ताउम्र हमारे साथ रहती है। दुनिया के सारे बच्चे ऐसी ही यादों को सहेजकर बड़े होते हैं। मन में ऐसी ही याद एक नाम की है जो मेरे जीवन की सबसे पहली यादों में बसा है। मेरे जन्म की जगह...ऋषिकेश।


उस वक़्त ऋषिकेश एक कस्बा हुआ करता था। कुछेक तांगे सड़कों पर दिखाई देते। रोडवेज़ की बसें, ठेलियाँ, बजाज के दुपहिया चक्के, साइकिलें, सब कुछ एक पतली सी पक्की सड़क के बीच में बहुत कम संख्या में दौड़ते। सड़क के किनारे फुटपाथ यूकेलिप्टिस की छाँव से खेलते। ऋषिकेश एक दैविक मान्यता से घिरा स्थल है। लेकिन जब मैंने  ऋषिकेश नाम को जाना तो मुझे लगा कि ऋषियों के कारण  ये नाम पड़ा होगा। काफी कुछ सत्य भी था। किवदंतियों में कहा जाता है ऋषि रैभ्य ने इस स्थान पर ईश्वर के दर्शन के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान हृषीकेश के रूप में प्रकट हुए। तब से इस स्थान को ऋषिकेश नाम से जाना जाता है। दूसरी कथा के अनुसार देवासुर संग्राम में समुद्र मन्थन के दौरान निकला पहला रत्न विष निकला, जिसे शिव ने इसी स्थान पर पिया था। मिथकों में यह भाग अलकापुरी की सीमा में बताया गया है। वही अलकापुरी जो यक्षों के स्वामी कुबेर की नगरी है जिसकी पृष्ठभूमि में महाकवि कालिदास ने वियोग श्रृंगार रस का महाकाव्य 'मेघदूतम' रचा था।


इन सब कहानियों से सराबोर होती हुई पर्वतों से दौड़ती गंगा इस स्थान पर बैठकर त्रिवेणी कहलाती है। त्रिवेणी याने गंगा, यमुना, सरस्वती का संगम। लेकिन मेरे लिए ये एक नदी का किनारा था जिस पर साधु-संत, भिखारियों की पंक्तियां और सामान्य लोग दिखाई देते। कुछेक प्रतिष्ठान उस पतली सी गली में आस-पास थे। कहीं गुड़िया के गुलाबी बाल एक डण्डे पर बँधे एक कन्धे के सहारे पूरा शहर घूमते जिन्हें देख मन ललचाता । चार पैरों पर खड़े खोखे जैसी संरचना के भीतर संतरे की टॉफियाँ प्लास्टिक के डब्बों से मेरे मुख की लार को आकर्षित करती।  सोडा वाली बोतलें जिसके मुख पर कंचा तैरता था, चाट-पकौड़ियों की कुछ ठेलियों के साथ खाने-पीने के शौकीन लोगों का इंतज़ार में चमकती रहती। कुछ अन्य दुकानें भी थी एक दुकान में फोटोग्राफर फ़ोटो खींचने का काम करता। फ़ोटो को एक बार में क्लिक करवाना उसकी जिम्मेदारी थी। एक दिन जब हम भाई-बहिन को उस दुकान के भीतर फ़ोटो खींचने एक बेंच पर बैठाया गया तो उसने हमें एक प्लास्टिक की गुड़िया दी उसके बाद 'आहा...आहा' करके हमारी गर्दन उठवाने की कोशिश में उसने बड़ी देर में एक फोटो निकाली। 


एक दिन याद आता है जब मैं चार साल की थी और मेरे पिता ने मेरी उम्र पाँच वर्ष लिखवा मेरा दाखिला करवाया। एक वर्ष वरिष्ठ तो मैं उसी दिन हो चुकी थी ये काफी बड़ी उपलब्धि रही क्योंकि आज भी अपनी इस उपलब्धि पर मैं मौन रहना स्वीकार करती हूँ क्योंकि स्त्री जाति पर वैसे भी उम्र का प्रभाव ज्यादा ही हो जाता है। राजकीय नियमों में हाई स्कूल के दस्तावेज बड़े महत्वपूर्ण हैं । उन पर जन्म दिनाँक अंकित हो जाये तो इसे गलत सिद्ध करना दुर्लभ है याने आज दसवीं के प्रमाण पत्र सही नहीं हो सकते या कहे कि वो साल जो मैंने जिया ही नहीं मेरा साथ कभी नहीं छोड़ेगा । खैर इसके कतिपय फायदे लौटती ज़िंदगी में शायद कुछ हो जाये। बच्चे के स्कूल जाने के प्रथम दिवस में काफी विशेषताएं होती हैं । परिवार से बाहर दुनिया में पहला कदम। कितनी अंजानी सी राह...पेड़ की छांव को छोड़ते पंछी की तरह। 


               मुझे आज भी वो दिवस बखूबी याद है। हमारे घर में एक पुरानी सी साईकल थी "एटलस" कंपनी की उस साइकिल के डण्डे पर आगे एक गद्दी लगी थी । उस साईकल में आगे बैठकर अपने स्कूल की सवारी बहुत दिनों तक की। साईकल जीवन को सुगमतापूर्ण जीने का एक साधन था । मेरे लिए तो वो मर्सीडीज ही थी । चार सौ की इस साईकल में वो संतोष था जो आजकल जीप कंपास , औडी की गाड़ियों में भी नहीं मिलता। अधिकतर लोगों को इनकम टैक्स वालो का भय अलग दिल का मरीज भी नहीं बनाता था। साईकल के ज़माने की भी अपनी यादें हैं । हर घर में साईकल को रोज़ चमकाया जाता था और फिर वो भी बड़े रौब में चलती थी। अपने स्कूल की पहली बार यात्रा इसी में बैठकर की जानी थी। माँ ने बड़े प्रेम से सांवले रंगत पर मेरी बड़ी बड़ी आँखों मे काजल लगाया । आंखों को पार करता काजल । फिर मेरे पिता ने मुझे उस साइकिल पर आगे गद्दी में बिठा स्कूल के बाहर उतारा।


             मुझे उस अजनबी जगह में 'घर' नहीं दिखा ये मेरे लिए बड़ा अप्रत्याशित रहा । मैंने वहाँ रौद्र रूप में तेज स्वर में रोना शुरू किया। वैसे भी बालहठ से बड़ी कोई चीज़ नहीं होती । ये कृत्य कुछ ज्यादा ही प्रभावी रहा होगा क्योंकि मुझे याद है कि मेरे पिता ने गुस्से में मेरा हाथ पकड़ कर ज़बरदस्ती स्कूल की तरफ धकेला। मैं ज़मीन पर गिर गयी। प्रतिमा मैडम मुझे लेने आई थी और वो मुझे देखती ही रह गयी। मैं वापिस घर आ गयी। उसके बाद मुझे बाथरूम में बंद करवाकर स्कूल जाने के लिए हाँ करवाई गई ठीक जैसे निकाह होने पर जबरन हाँ करवाई हो और फिर उसी दिन दोबारा अपनी आंखों को काजल में सना मैं स्कूल गयी प्रतिमा मैडम ने टॉफ़ी देकर मुझे चुप कराया और अंदर ले गयी लेकिन सच कहूँ तो उस समय मैं मैडम से नज़रें नही मिला पा रही थी। उनके सामने अपमान जो हो गया था। वो मेरी पहली अध्यापक थी जिनके बारे में काफी दिनों में मालूम हुआ कि घरेलू समस्त ज़िम्मेदारियों को निभाने हेतु उन्होंने विवाह नहीं किया।आज सोंचती हूँ उस वक़्त का सामाजिक मूल्य का कितना कठिन कदम उन्होंने उठाया था। स्कूल की उस पहली घटना के बाद आज दिवस तक किसी भी मौसम या हालात में मैंने कोई कक्षा ज़िद की वजह से कभी नहीं छोड़ी।


Thursday, 20 May 2021

2. अबोध मन के स्मृतिचित्र


मेरे बड़े भाई का जन्म मेरे होने से साढ़े तीन साल पहले हो चुका था। उसका नाम बॉबी था जो अपभ्रंश होकर बब्बी हो गया था। मैंने भी उसे इसी नाम से पुकारा जिस कारण कई बार मुझसे उसका झगड़ा होता। अक्सर मुझसे कहता कि वो मुझसे साढ़े तीन साल बड़ा है इसलिए मुझे उसे भैया संबोधन करना चाहिए। उस समय भूरे रंग का एक रेंगता हुआ कीड़ा ज़मीन पर दिखाई देता था। उसके बहुत सारे पैर थे। उस्का असल नाम कानखजूरा था। ये शब्द कठिन था इसलिए अशुद्ध रूप 'कानकनिच्छा' ही मेरी जुबान पर चढ़ा। मुझे वो बेहद गंदा और डरावना लगता। इसलिए मैंने अपने बड़े भाई का निक नेम 'कानकनिच्छा' रख दिया। हम साथ-साथ खेलते । एक बार हम दोनों आँगन में खेल रहे थे। एक मोटा सा चींटा भी ज़मीन पर घूम रहा था।

 " क्या तू इसको पकड़ सकती है? देख मैं इसे कैसे पकड़ता हूँ।" भाई ने अपने हाथ के अंगूठे और तर्जनी का प्रयोग कर पिछले हिस्से से उसे पकड़ा फिर ज़मीन पर छोड़ दिया। मैंने भी अपनी नन्हीं सी बुद्धि से अगले हिस्से से चींटे को पकड़ा जिसके परिणामस्वरूप उसने मुझे डंक मारा और पूरे आँगन में खून के छींटे बिखर गए। 


 दिमाग़ की संरचना के भीतर बहुत सी घटनाओं की स्मृतियाँ यादों की तहों में जीवंत रहती हैं। उन्हीं घटनाओं में से कुछ- कुछ यादें मेरे अंतस की नदी में क्रीड़ा करती हैं। ऐसी ही एक याद में सरकारी अस्पताल का एक कमरा दिखता है, जिसमें एक लोहे के पाइप वाला पलंग मुख्य द्वार वाली दीवार पर बनी एक खिड़की के सानिध्य में लगा था, जिस पर मेरी माँ लेटी थी । मैं बेहद छोटी थी शायद तीन वर्ष से कुछ दिन अधिक ...उम्र इसलिए निश्चित है क्योंकि मेरे ओर मेरे छोटे भाई में इतनी अवधि का अंतर है। वो कमरा कितना बड़ा था, ये कहना भी मुश्किल है क्योंकि नन्हीं आयु की आँखे सिर्फ़ घटनाक्रम देख पाती हैं आकार व वस्तु की परिसीमाएँ नहीं। सारे दरवाज़े व खिड़कियों का रंग पीला था। कमरे की अधिकतर चीज़े या तो सफ़ेद थी या फिर हरी। सफेद पलंग था और हरे रंग के पर्दे दरवाज़े पर लहरा रहे थे। मेरे पिता ने मेरा कौन सा हाथ पकड़ा था ये तो याद नहीं लेकिन कुछ लोग माँ को आपरेशन के लिए अंदर ले जा रहे थे। आपरेशन के बारे में उस समय जानकारी नहीं थी। कुछ देर बाद एक नन्हा सा शिशु जादुई अवतरण लेकर मेरे समक्ष आ चुका था। 

मैंने अपने पिता से पूछा, " ये कहाँ से मिला?"

उन्होंने मुझे बताया कि डॉक्टर ने अस्पताल से दिया। मेरे मन में भी यकीन घर कर गया कि अस्पताल से बच्चे मिलते हैं। इस बात पर मेरा यकीन तब तक बना रहा जब तक कि मेरी एक सहेली ने ये नहीं बताया कि उसकी माँ के पेट से डॉक्टर ने आपरेशन करके उसके भाई को निकाला था। 


कुछ बरसों बाद मैं इस अस्पताल में दोबारा गयी...लगभग नौ या दस साल की उम्र में। नीले रंग का अम्ब्रेला सूट पहना हुआ था जिसमें कुछ कीड़ेनुमा आकृतियाँ लाल -बैंगनी से रंग में बनी थी। मुझे बुख़ार था। चलने का मन भी नहीं हो रहा था फिर भी रास्ते में कई चित्र मजबूरन दिखने को मिल रहे थे।अस्पताल की पीले रंग की इमारत के गलियारे में कई लोग बैठे थे। अधिकांशतः सिर पर पल्ला रखे हुए युवतियाँ

 व प्रौढ़ महिलाएं रोते हुए बच्चों को संभाल रही थी, पुरुषों के भी बहुत से वर्ग थे, जिसमें से कुछ बाहर प्रांगण में जाकर तेंदुवे की पत्तियों का सदुपयोग करके धुँए के बादल अपने नाक व मुख से निकाल रहे थे। मुझे धुँए की गंध उबकाई दिला रही थी। लेकिन डॉक्टर के पास पहुँचने के लिए पैदल चलना मजबूरी थी। उस समय तक प्राइवेट अस्पताल का अधिक चलन नहीं था और पैसे की हैसियत सरकारी तरीकों में ही वर्चस्व प्राप्त कर सकती थी। इस सरकारी अस्पताल में चिकित्सक अपने काम के प्रति बेहद वफादार रहते थे। अमीर व गरीब सभी तबके के लोग दूर-दूर से चिकित्सक की सत्यनिष्ठा व उपचार की प्रसिद्धि के कारण इलाज कराने आते।

1990 के दशक का पूर्वार्द्ध था। वैश्विक पटल पर पूंजीवाद व साम्यवाद के नए समीकरण बन रहे थे। यू0एस0एस0आर0 जो भारत का सर्वप्रिय मित्र था वह संकट झेल रहा था। भारत भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण की नीतियों का हिस्सा बनने के करीब था। उस समय एक दुबली सी लड़की उस सरकारी अस्पताल में बड़ी कठिनाई से पैदल चलकर डॉक्टर के कमरे तक आयी थी। डॉक्टर ने पैंट व कमीज़ के ऊपर एक सफ़ेद आधी बाँह का कोट पहना था और स्टेथेस्कोप की दोनों बाहें डॉक्टर की गर्दन से लिपटी थी। एक पतला से चश्मा लगा था जो नाक की नोक पर टिका था । मोटी सी भौहों को ऊपर - नीचे कर वह बात कर रहे थे। डॉक्टर की कुर्सी व मेज के साथ मरीज के बैठने के लिए एक स्टूल था जिसके ऊपर स्टील की थाली जैसी आकृति हिलती सी दिख रही थी। सारे कमरे में डेटॉल की गंध फैली हुई थी। डॉक्टर साहब हर मरीज़ को देखकर अपने हाथ एक कटोरे में रखे डेटॉल के पानी मे डुबोते फिर दूसरे मरीज को देखते। वह सामान्य डील- डौल के व्यक्ति थे उनके चेहरे पर आत्मविश्वास झलकता था। उनकी काली मूँछे बड़ी थी आवाज़ में भारीपन था। 


मुझसे पहले एक ग्रामीण महिला अपने बच्चे को लेकर उस थालीनुमा स्टूल पर बैठ गयी। उसने अपने बच्चे की बहती हुई नाक को अपने दाएं हाथ के अँगूठे व अनामिका से पकड़ लगभग नोचते हुए उस श्लेष्मयुक्त पदार्थ को अपनी दाईं ओर की दीवार में सजा दिया। उसकी ये हरकत वहाँ खड़े सभी लोगों ने देखी। 

इस क्रिया के उपरांत डॉक्टर साहब ने विनोदी व तेज स्वर में उससे कहा, " वहाँ क्यों पोछा तुमने? मेरे इस कोट में पोछ देती। कैसे हो यार तुम लोग....बताओ क्या तकलीफ है बच्चे को? "

" डॉक्टर साब। बुखार नहीं उतर रहा। " उस महिला ने कहा।

डॉक्टर ने कुछ पर्चे में लिखकर उसे जाँच हेतु भेजते हुए कहा,

" ये जाँच करवा के दिखाओ मुझे।"

उसके बाद मेरा नंबर आया। डॉक्टर ने मुझसे पूछा,

"बेटा क्या परेशानी है? बताओ।" 

"बुखार है।" मैंने कहा। 

डॉक्टर ने अपने स्टेथेस्कोप को कान में टिकाकर सिक्केनुमा आकृति को मेरे सीने पर लगाया । अपने हाथों से मेरी दोनों आंखों के नीचे वाली बॉरोनियों के भीतर झाँका फिर मुझे पीछे घूमने को कहा। 

मुझे ऐसा घूमने वाला स्टूल कभी नहीं मिला था मैं बुख़ार की पीड़ा को भूल उसमें मज़े से घूमने लगी। इस अवधि में डॉक्टर ने पर्चा लिखकर पिता को दिया। मेरा दिमाग़ उसी स्टूल में वापिस घूमने को लालायित होने लगा...खून की जाँच कराई गई व डॉक्टर ने ग्लूकोस चढ़ाने के लिए एक वार्ड में भेज दिया। वार्ड में अंदर जगह नहीं थी बाहर के बरामदे में एक बेड लगाया गया और हाथ में सुई को घोपकर वो उपकरण फिट किया गया। उस उबाऊ समय में उस बोतल से बूँद टपकती हुई देखती रही। रिपोर्ट में मलेरिया की पुष्टि हुई और रोज़ एक ग्लूकोज़ की बोतल चढ़ाने मुझे उस अस्पताल ले जाया गया। कोई 'पाइलोबैक्ट किट' के साथ कड़वी सी दवा थी ऐसी बेस्वाद दवा दोबारा कभी नहीं चखी। ठीक होने पर आखिरी दिन डॉक्टर के उस स्टूल पर मैं बैठ पाई थी। उसके बाद जब भी मैं बीमार हुई उस अस्पताल में नहीं गयी । एक नए सरकारी अस्पताल का निर्माण हो चुका था .... पुरानी यादें पीली दीवारों के साथ युगलबंदी कर सो चुकी थी।

 ये यादें बमुश्किल तीस बरस पहले की हैं वो सड़क आज भी उसी रास्ते से गुजरती है बस अभी थोड़ी चौड़ी हो चुकी है । सड़क का ये विस्तार जनसँख्या के बढ़ते कदमों से हुआ लगता है। उस समय आज की तरह सड़कों पर निज संपत्तियों का एकाधिकार नहीं दिखता था। सड़क के ऊपर सार्वजनिक वाहन व गिने-चुने निजी वाहन दौड़ते थे । निजीकरण, उदारीकरण व भूमंडलीकरण के बीच का संक्रमण काल मेरे सामने से गुज़र रहा था। कई परिवर्तन अपनी बारी का इंतज़ार करने को उत्सुक थे। मेरा जन्म वर्ष 1981 के उत्तरार्द्ध में हुआ। धरती पर उस वक़्त तीन से साढ़े तीन किलो की ये रचना कुछ दिनों बाद से अपनी दो आँखों के साथ दुनिया को बिना किसी समझ के देख रही थी। सामाजिक मान्यताएं, रूढ़ियों वाले उस समाज में शायद ही किसी ने चोगे वाले फ़ोन से अधिक कोई कल्पना की होगी। किसी मासूम से बच्चे की जीवन यात्रा में उसके परिवार के संस्कारों से अधिक उसके समाज की मान्यताएं पहले स्थापित होती हैं। 


ऐसे ही एक स्मृति पिता की गोद में रोने की है। उम्र शायद चार से पाँच साल। हम किसी के घर पर थे और मेरा रोना जाने किस कारण था। बार - बार कुछ स्वर मुझे चुप कराते।

 "बड़ी - बड़ी आंखों वाला बच्चा क्या खायेगा?" एक कहता।

"चलो आओ घुम्मी चलें।" कोई दूसरी आवाज़ होती। 


जब मेरी अप्रत्याशित चीख नहीं रुकी तो सम्यक् विचारोपरांत मतैक्य स्थापित किया गया कि मुझे किसी की नज़र लगी है व किसी अच्छे जानकार आदमी से नज़र उतारनी होगी । हम घर आए घर की दहलीज़ आने से पहले ही आकस्मिक रूप से मेरा रुदन बन्द हुआ और घर आकर मुझे मेरे दूसरे के घर रोने के कारण बहुत डाँटा गया लेकिन ये भी याद आता है कि मुझे नज़र उतारने के लिए तत्समय जाने- माने सिद्धहस्त पुरुष के पास ले जाया गया। जिसका नाम, राम के नाम से शुरू होता था .... रामभरोसे या फिर रामअवतार। याद नहीं किंतु राम में मिलकर ही बना था। वो या तो रात थी या प्रातः होने से पूर्व का अंधेरा लेकिन चाँद आकाश से पृथ्वी की ज़मीन को घूर रहा था। मेरे पिता हीरो साईकल में हैंडिल के आगे की गद्दी में बैठाकर मुझे उसके पास ले गए थे । उसका घर पास ही था।

"राम ....... दरवाजा खोल, ज़रा लड़की की नज़र उतारनी है।" उसके दरवाज़े पर खटखटाकर पिता ने आवाज़ लगाई।

"हौ... आया।" वो दरवाज़े से बाहर आया।

इस सिद्धहस्त पुरुष के दर्शन से पहले मैंने शिवरात्रि के मेले में जादूगर देखे थे जो मुख से कुछ फुसफुसाकर कहते और पंखों के रंग बदल जाते। मुझे वो आदमी भी जादूगर ही लगा। हालाँकि उसकी वेशभूषा में काले कोट पैंट व टोपी का मिश्रण नहीं था उससे उलट वह एक सफ़ेद बनियान और सफ़ेद धोती पहने थोड़ा झुककर रहस्यमयी मुद्रा में उस कुटिया से बाहर आते दिखाई दिया । 

इस राम के नाम वाले आदमी की कद - काया सामान्य थी एक पतला या कहे मरियल श्रेणी में रखे जाने वाला व्यक्ति, जिसे अपनी नज़र उतारने वाली विद्या पर गुरुर था। ये एक सामान्य सी बात मानी जा सकती है क्योंकि भारतीय परिवेश में झाड़-फूँक व धर्म को विज्ञान से आगे ही माना जाता है। आस्था व विज्ञान की राहें अलग कर दी जाती हैं। फिर वह नाम में ही राम नाम के साथ अवतरित हुआ था और मात्र नज़र उतारने के गुर से समाज के सभी वर्गों व वर्णों में प्रसिद्धि पा सकता था इसलिए उसने भेड़ो को चराने के अलावा ये दूसरा व्यापार खोला था। ये उसकी अतिरिक्त कमाई का भी साधन था। 


निश्चित तौर पर मेरे घर में भी यही व्यवस्थाएं थी जिसका परिणाम यह था कि मुझे 'राम' के द्वार पर लाया गया था। चाँद की रोशनी इतनी थी कि हम लोग एक दूसरे के काले साए देख सकते थे। उसने ज़मीन से एक पत्थर उठाया व मिट्टी में एक गोला बनाया और मुझसे कहा,

" इहाँ बैठ जाओ बिटिया।" 

मैं चुपचाप उस गोले के भीतर बैठ गयी। मेरा मुख उसके सामने था । वह कुछ बुदबुदाया और फिर आखिरी बार उसने वो पत्थर अपने पीछे फेंक दिया।

" चलो उठ जाओ बिटिया। " उसने कहा।

पिता की और देखकर उसने कहा,

"पण्डित जी , बड़ी तेज़ नज़र लगी थी। अब सब ठीक हो जाएगा। दो दिन और झाड़ना पड़ेगा तभी असर होगा।"


बिना किसी तार्किक विश्लेषण के मुझे अगले दो दिन उसके पास ले जाया गया। उस दिन लगा कि कुछ बातों के प्रश्न नहीं होते। उस समय बच्चों पर बहुत नज़र लगती थी।  मेरा रंग गेंहुवे से साँवले रंग में चमकता था। मुझे नहीं लगता कि सौंदर्य नज़र लगने का कारक होता होगा। आस -पास के कई बच्चे काले- गोरे रंग के दिखते लेकिन 'नज़र' बिन किसी विशेष आकर्षण के सबसे समान व्यवहार करती। नज़र लगने की मान्यताओं को पोषित करने हेतु राम भरोसे या राम अवतार जैसे लोग थे ही....जब पढ़े-लिखे लोग बच्चों को काला टीका, धागा व नजरिया में बांध रहे थे तो फिर मेरे घर में इस बात पर कौन प्रश्न करता। ये कहना ज्यादा सुलभ है कि पढ़े-लिखे व अनपढ़ लोगों की दृष्टि में नज़र की मान्यता वैज्ञानिक कारणों से विमुख एक सामाजिक मूल्य था।


Wednesday, 19 May 2021

1. पिता पर्वत की गोद

मेरी जीवन यात्रा, एक छोटी सी बेल पर खिले हुए पुष्प जितनी महत्वपूर्ण है। फूल खिलता है फिर धीरे - धीरे मुरझा जाता है। सारी चीज़ें पुरानी होकर खत्म होती हैं। ये सृष्टि का नियम है। मेरे होने का इतिहास मुझे ही लेखबद्ध करना है। कागज़ के युग भी जाता दिखाई देता है। डिजिटल कागज़ और स्याही भविष्य में किस रूप में होगी ये विचार मेरे जीवन के समय से कोसों दूर है। मैं तो उस समय की बात लिख सकती हूँ जो मुझे छूकर गुज़रा है। मेरा अपना समय जो नश्वर होता गया पुरानी होती चीज़ों की तरह। 

मेरा रिश्ता हिमालय से अनायास ही हो गया। उसके ही पहाड़ों में मेरे जीवन की डोर थमी। हिमालय के उस हिस्से का नाम था टिहरी गढ़वाल, जिसके एक गाँव मे मेरे दादा जी का भी एक घर था । दादाजी का नाम पुरुषोत्तम दत्त बंगवाल था। वे पूजा- पाठ का काम करते थे। उन्होंने खेती, पूजा-पाठ करने वाले लोगों के मध्य अपना अधिकांश जीवन बिताया इसलिए उनकी दुनिया उतनी बड़ी ही थी जितनी सिकंदर के समय सिकंदर की। फिर ऐसा होना लाज़मी भी था। जब दूरस्थ स्थानों में  किताबों का विज्ञान कोसो दूर हो । रोटी, कपड़ा, मकान का संघर्ष मिट्टी से मिलता हो। मोबाइल व टेलीविजन भविष्य की झोली में झूल रहा हो। सिर्फ़ बम फेंकने वाले देश के रूप में रेडियो पर अमेरिका का नाम सुनाया जा रहा हो और रेडियो की उपलब्धि विशिष्ट उच्च वर्ग की पहचान हो। ऐसे में दुनिया उसी स्थान के चारों ओर तक सीमित रह जाती है। 

दादाजी के लिए भी अधिक पढ़ा-लिखा होना अधिक महत्वपूर्ण नहीं था। मेरी बुआएं पढ़ी-लिखी नहीं थी। पुत्र होने के कारण मेरे पिता व चाचा को पढ़ने का अवसर मिला। मेरे पिता मेरे दादा जी से अधिक सज्जन स्वभाव के थे। आठवीं दर्जे तक पढ़ाई करने के बाद उन्होंने कई प्रकार के काम सीखे। जैसे बिजली के तारों का काम, लकड़ी का काम, रंग-रोगन का काम, मिस्री का काम। ऐसी लगनशीलता कहाँ से उनके अंदर आयी ये कहना मुश्किल है। उन्नीस या बीस वर्ष की आयु से वह ऋषिकेश आ गए व सरकारी महकमे में एक छोटी सी नोकरी करने लगे। वहीं दो कमरों के सरकारी आवास में सपत्नीक रहने लगे। मैं दो भाइयों के मध्य की संतान रही।

मेरे पिता बहुत शांत स्वभाव के व्यक्ति थे। मैंने कभी उन्हें बहुत अधिक बातें करते नहीं देखा । न ही दिल खोलकर हँसते देखा। अक्सर कई बार मैं हँसते - हँसते ज़मीन पर गिर जाती तब भी उनके मुख पर दंतपंक्ति नहीं दिखती थी। शायद उन्हें अपने जीवन का बेहद संतोष था शायद ही उनके कारण किसी को कभी कोई कष्ट हुआ हो। मेरे पिता का नाम लोकानन्द  था । लोगों में मान्यता है कि व्यक्ति का नाम उसके व्यक्तित्व पर प्रभाव डालता है। वैज्ञानिक रूप से ये भले सत्य न हो किन्तु उनके साथ ये सत्य ही लगता था। 

सदियों पहले वर्तमान उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्र की कल्पना एक घने दुर्लभ प्रदेश की भाँति की जा सकती है। अंग्रेजों की व्यवस्थाओं व अशोक के शिलालेख से कहीं पहले । पौराणिक मिथकों से कहीं पूर्व इस भूभाग में बसावट की शुरुवात हुई। मौलिक जातियों के बीच मैदानी क्षेत्रों की जातियाँ स्थापित हुई।  माना जाता है कि कुमाऊँ क्षेत्र के लोग मध्य भारत की धरती से यहाँ आए। गढ़वाल क्षेत्र के लोगों के बारे में भी मान्यता है कि महाराणा प्रताप के वंशज इस पहाड़ी क्षेत्र में आए और यहीं बस गए। साहित्यकार भी भाषा, बोली आधार पर विभिन्न मानक स्थापित करते रहे। 

मनुष्य की वंशावली का प्रयोग मात्र ऐतिहासिक तथ्यों की पूर्ति करने हेतु प्रसंशनीय होते हैं। वंशावली व डी0एन0ए0 में एकरूपता स्थापित नहीं की जा सकती। करोड़ो वर्षों से हमारे खून का मिश्रण होता रहा और आगे भी होता रहेगा। मानवीय उन्नयन में जाने मेरे पूर्वज अंध महाद्वीप से आये हों या फिर मध्य एशिया से। मानव के विभिन्न संकरणों से गुजरते हुए मेरा भी उद्भव हुआ। चूँकि समाज में कुल व गोत्र परम्पराराएँ प्रासंगिक रहती हैं इसीलिए मेरे मन में भी विचार आया कि मैं अपने कुल के प्रथम पुरुष तक पहुँच पाऊँ। एक दिवस मेरे दादा जी से मैंने ये प्रश्न पूछा तो दादा जी के दादा जी तक ये क्रम पहुँच सका उससे अधिक जानकारी उन्हें नहीं थी।


एक बार मैंने अपने पिता से पूछा, " ब्राह्मण में इतनी जातियाँ क्यों हैं?"

" हमारा गोत्र भारद्वाज है। गढ़वाल में कई जातियाँ है। ब्राह्मणों के प्रकार है। सरोला व गंगाड़ी ब्राह्मण होते हैं।" पिता ने कहा।


"हम कौन से ब्राह्मण हैं?" मैंने प्रश्न किया।


" बंगवाल जाति गंगाड़ी ब्राह्मण में आते हैं। ये लोग पर्वत की तलहटी में रहते हैं । गंगाड़ी के अलावा सरोला ब्राह्मण भी पहाड़ में रहते हैं । सरोला पर्वतों की चोटियों पर रहते हैं। अब चूँकि ये राजदरबार के ब्राह्मण रहे तो उत्सवों में इनके द्वारा ही भोजन बनाया जाता है।" उन्होंने कहा।


"तो फिर क्या पर्वतों के ऊपर बसने से या फिर राजा की रसोई बनाने से ये श्रेष्ठ हैं?" मैंने पूछा।

" नहीं , यदि ऐसा होता तो सरोला व गंगाड़ी आपस मे वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं करते। गोत्रों में समानताएं मिलती हैं। बंगवालों का गोत्र भारद्वाज है। " उन्होंने कहा।


दरअसल मेरी जाति के लोग मध्यप्रदेश से गढ़वाल के बांगा गांव में बसे थे। हालाँकि साहित्यकार व स्थानीय तथ्यों में मतभेद मिलते हैं । जो भी सत्य रहा हो किन्तु संसार के किसी भी भूभाग पर एक सदी रहने के बाद मूल निवासी का दर्जा मिल जाता है। मनुष्य के सौ बरस के औसत जीवन में वंशावली का महत्व इतिहास जानने के लिए ज़्यादा आवश्यक है बनिस्पत रंग, जाति, धर्म के मानकों का महिमामण्डन करने के। इसके बावजूद नस्लों की छ्द्म विरासतें वंशो में जन्म लेने के नाम पर आत्मगौरान्वित होती हैं ।

वंशावली के नाम जैविक गर्भ के अतिरिक्त अन्य संदर्भ साक्ष्य से सिद्ध नहीं किए जा सकते। इसके बावजूद विभिन्न सामाजिक वंशावलियों में शुद्धता के मानक स्पष्ट किए जाते हैं। विकासवादी सिद्धान्त में इस प्रकार की व्यवस्थाओं से धर्म, क्षेत्र व जाति आधार पर बहुत से समाज स्थापित हैं। वंशावली में अक्सर एक 'सर नेम' की परंपरा होती है जिस कारण मुझे भी 'बंगवाल' सर नेम विरासत में मिला। इससे मुझे कुछ उपलब्धियां अनायास से हुई। जैसे मेरे नाम से ब्राह्मण व उत्तराखण्ड मूल स्वतः परिभाषित हुआ।



||9|| स्नेहा और गणित -दो

उसका नाम स्नेहा गुप्ता था। उसका पूरा व्यक्तित्व बेहद प्रभावित कर देने वाला था। उसके काले रेशमी बाल बेहद घने थे जो बड़ी मुश्किल से जबरन किसी ब...