उसका नाम स्नेहा गुप्ता था। उसका पूरा व्यक्तित्व बेहद प्रभावित कर देने वाला था। उसके काले रेशमी बाल बेहद घने थे जो बड़ी मुश्किल से जबरन किसी बैंड से बंधे होते। बाद में एक फिल्म 'कुछ कुछ होता है ' की नायिका रानी मुखर्जी के बाल उसके जैसे लगे। हम दोनों स्नातक तक एक कक्षा में रहे, लेकिन वो हमारे मित्र समूह की सदस्य नहीं थी सो ज्यादा बात भी नहीं होती थी फिर वो स्मार्ट थी जो उसकी सुंदरता पर हावी था। कुल मिलाकर वह पसंद किए जाने योग्य थी लेकिन यदि उसके बारे में किसी ख़ास पहलू के बारे में मुझे नहीं मालूम , तो ये मेरी सूक्ष्म दृष्टि पर भारित उसकी विशेषता थी। लड़कियों की भी कई प्रजातियां होती हैं। इसलिए सुंदर व स्मार्ट होना दो भिन्न बाते हैं । मैं इन दोनों कैटगरी में नहीं आती थी और ये अच्छा भी रहा क्योंकि मैं उन दोनों प्रकारों में भेद कर पाने में सक्षम थी। लेकिन नेहा में दोनों बातें समाहित थी और उस समय के 'मॉडर्न' शब्द को प्रसारित करती थी। उस समय एक नए गीत का पदार्पण हुआ था "सेक्सी - सेक्सी लोग मुझे लोग बोले", जिसे गाने की हिम्मत किसी में न होती लेकिन एक नया शब्द प्रचलित हुआ था.."सेक्सी" , जिसका तात्कालिक रूप से सही सही शाब्दिक अर्थ बुरा ही था किन्तु आज के परिप्रेक्ष्य में इतना कहा जा सकता है कि स्नेहा में 'सेक्सी स्मार्टनेस' रही है।
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'मॉर्डन' लड़कियों के साथ रहने में बड़ी असहजता का अनुभव होता था जबकि सुंदर लड़कियों के साथ सहजता हो ही जाती थी। स्नेहा में इस दोगुने प्रभाव के कारण मेरी उससे ज़्यादा नजदीकी मित्रता नहीं रही। सुंदर लड़कियों व स्मार्ट या मॉर्डन लड़कियों को छोड़कर जो शेष जमात बचती थी उसमें मेरा भी नंबर आता था। हालाँकि मेरी और से सुंदर श्रेणी में सम्मिलित होने की चेष्टा होती रही लेकिन फिर भी मुझे उस श्रेणी का पायदान भी नहीं मिल सका। खैर वर्ष 1997 की बात थी । बोर्ड परीक्षा होनी थी। स्कूल की और से अनुभव हेतु अर्द्धवार्षिक परीक्षाएं आयोजित होती थी। ऐसे ही एक बार 'गणित-दो' का प्रश्न पत्र था। मेरे बगल में बाई वाली पंक्ति में स्नेहा शुरू से दूसरे नंबर पर बैठी थी। याने मैं अपनी पंक्ति में चौथे स्थान पर थी। नेहा से प्रश्न उत्तर संपर्क हेतु मुझे आगे देखना होता और उसे पीछे। पत्र में कुछ वैकल्पिक प्रश्न हुआ करते थे , जिसमे चार विकल्प होते थे। यदि किसी को किसी प्रश्न का उत्तर पूछना हो तो एक्जामिनरों की दृष्टि से बचते हुए 10 प्रश्नों तक आराम से 10 उंगलियों के प्रयोग करते हुए और चार उंगलियों से विकल्प का प्रयोग करके बात बन जाती थी फिर ये मासिक प्रश्न पत्र जैसा ही था।
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अब स्नेहा ने ये जोखिम उठाया और मुझसे प्रश्न पूछा।
लड़कियों में नम्बर पाने के लिए जंग सी छिड़ी रहती थी या कहे ये सार्वभौमिक सत्य भी है, क्योंकि मैंने उच्चतर स्तर की परीक्षाओं में स्वयं ये अनुभव किया है। आधे-आधे नंबर पर लड़कियों के व्यक्तित्व में गर्व नामक ताज सज जाता है। जबकि लड़कों में ऐसे स्त्रियोचित लक्षण नगण्य होते हैं। अब स्नेहा तो पहले से ही बेहद अनमोल गुणों की स्वामिनी थी। और फिर विद्या के क्षेत्र में ही उससे प्रतिस्पर्था की जा सकती थी और ये अच्छा मौका भी था। स्नेहा ने अपने बगल से दाएं हाथ की चार उंगलियों को उठाया। मैंने उसे देखा। मुझे चौथे प्रश्न का विकल्प आता था।लेकिन मैंने उसको अनदेखा कर उसकी और अपने दोनों हाथों का प्रयोग करते हुए सात उंगलियां उठायी। स्नेहा ने मुझे मेरे प्रश्न के प्रत्युत्तर में दो उंगलियां उठाकर जवाब दिया।
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गणित का प्रश्न पत्र बेहद कठिन था। मुझे तो इसका टाइटल भी पसंद नहीं था। 'गणित-दो'...मेरे जैसे लोग गणित को 'गणित-दो' कहते...यू0 पी0 बोर्ड में कितना जबरन अत्याचार था। जीवन मे जो प्रश्न आज आसानी से हल हो जाते हैं ,बचपन मे वो ही पहाड़ से दिखते थे। गणित में टिगनोमेट्री, बीजगणित/रेखागणित में पाइथागोरस,विज्ञान में लेमार्क और डार्विन के वाद के बीच लुई पॉश्चर का पाश्चुरीकृत दूध , फिजिक्स में न्यूटन और बॉयल जैसे नीरस लोग अपने अपने आधिपत्य का कब्ज़ा जमाये थे। वहीं कबीरदास जी हिंदी की किताब में घूमते व कहते..."कबीरा यहु संसार है जैसे सेमल फूल".....उस समय के बालमन में किताबों का ये विरोधाभास मेरी समझ से बाहर था। फिर भी कबीर की बातों से मैं सहमत थी। हिंदी की किताब के कबीर , सूर, तुलसी, रहीम, बिहारी सबके दोहे आदि पढ़ना ज़्यादा बेहतर लगता था। इससे भी विचित्र बात ये थी कि उस समय किताबो के लेखक मुख़ज़बानी याद रहते। रमेश गुप्ता, कौशिक, बाउंट्रा- खन्ना, अग्रवाल ...जाने कौन कौन। हम सबके दिमाग़ की कुछ मेमोरी में समाते रहे। अब ऐसी विकट परिस्थितियों में नेहा से ज्यादा अंक लाने की सोंच को ग़लत भी कैसे कहा जा सकता है? अब हैं तो हम रटंत विद्या को ग्रहण करने वाले लोग। फिर इसमें मेरा क्या दोष?
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स्नेहा मुझ पर एक दृष्टि बनाये हुए थी उसे आशा थी कि उसको मैं भी जवाब बताऊँगी। मैंने कक्षा के पर्यवेक्षक की और दो तीन बार देखा फिर अपनी कॉपी में देखा ताकि स्नेहा को ये लगे कि पर्यवेक्षक के कारण मुझे नेहा को बताने में असुविधा हो रही है। अंततः वो काफी पहले अपनी उत्तर पुस्तिका को पर्यवेक्षक को पकड़ा कक्षा से बाहर चली गयी। मैं घंटी बजने के भी बाद बाहर निकली और नेहा ने मुझे पकड़ लिया
" तूने क्वेश्चन का आंसर क्यों नहीं बताया ?"
"बार-बार सर देख रहे थे..कैसे बताती" मैंने कहा।
ये ज्यादा बड़ा मुद्दा नहीं बना। फिर स्नेहा सचमुच नंबर पाने की मुरीद भी नहीं थी ..ये अधिक अंक लाने की लालसा वाला स्त्रियोचित गुण उसमें नहीं था। उसका आत्मविश्वास भी विलक्षण थ। उस समय वो प्रतिभा से युक्त किशोरी थी ।
स्नातक के दौरान एक बार हम दोनों अपनी एक मित्र पंकज की शादी में शामिल होने लक्ष्मण झूला गए। स्नेहा और मैं। ये मेरे लिए गौरव की बात थी कि इतनी काबिल लड़की , जिसका हर चीज़ में वर्चस्व है । मुझे उसके साथ जाना पड़ रहा है। पंकज बहुत अच्छी बातें करती। उसका प्रेम विवाह था। उसके हल्दी हाथ मे हमें कुछ पैसे मिले थे , शायद हमने कप प्लेट जैसा कोई गिफ्ट भी दिया था। ज़्यादा कुछ अब याद नहीं.... लेकिन अब मुझे लगता है कि स्नेहा की मुस्कुराहट और हंसी आज भी बहुत खूबसूरत है। कुछ समझदारी मुझमें आई होगी लेकिन वक़्त ने उसको भी कितना तराशा होगा......
#कतरा_कतरा_लम्हा_ज़िन्दगी
( बड़े ही इत्तेफ़ाक की बात है कि जैसे ही मैंने नेहा के बारे में लिखना प्रारम्भ किया वैसे ही जुकरबर्ग की कृपा से नेहा ने मुझे ढूंढा और तुरंत बातें की। मैं टेलीपैथी विज्ञान नहीं जानती लेकिन सच में यदि किसी को याद किया जाए तो संभव है कि वो भी आपको वहाँ याद करता हो।)