Saturday, 29 May 2021

3. स्कूल का पहला दिन


    बचपन का संग...उसकी अमिट यादें बड़ी गहरी होती हैं।जाने दिमाग़ के हिस्सों में क्या-क्या समाता होगा। यादें मरती नहीं, तभी तो मन याद करता है।  मन के द्वारा समेटी हुई यादें, अच्छी या बुरी, चाहे जैसी भी हों, कीमती दौलत की तरह ताउम्र हमारे साथ रहती है। दुनिया के सारे बच्चे ऐसी ही यादों को सहेजकर बड़े होते हैं। मन में ऐसी ही याद एक नाम की है जो मेरे जीवन की सबसे पहली यादों में बसा है। मेरे जन्म की जगह...ऋषिकेश।


उस वक़्त ऋषिकेश एक कस्बा हुआ करता था। कुछेक तांगे सड़कों पर दिखाई देते। रोडवेज़ की बसें, ठेलियाँ, बजाज के दुपहिया चक्के, साइकिलें, सब कुछ एक पतली सी पक्की सड़क के बीच में बहुत कम संख्या में दौड़ते। सड़क के किनारे फुटपाथ यूकेलिप्टिस की छाँव से खेलते। ऋषिकेश एक दैविक मान्यता से घिरा स्थल है। लेकिन जब मैंने  ऋषिकेश नाम को जाना तो मुझे लगा कि ऋषियों के कारण  ये नाम पड़ा होगा। काफी कुछ सत्य भी था। किवदंतियों में कहा जाता है ऋषि रैभ्य ने इस स्थान पर ईश्वर के दर्शन के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान हृषीकेश के रूप में प्रकट हुए। तब से इस स्थान को ऋषिकेश नाम से जाना जाता है। दूसरी कथा के अनुसार देवासुर संग्राम में समुद्र मन्थन के दौरान निकला पहला रत्न विष निकला, जिसे शिव ने इसी स्थान पर पिया था। मिथकों में यह भाग अलकापुरी की सीमा में बताया गया है। वही अलकापुरी जो यक्षों के स्वामी कुबेर की नगरी है जिसकी पृष्ठभूमि में महाकवि कालिदास ने वियोग श्रृंगार रस का महाकाव्य 'मेघदूतम' रचा था।


इन सब कहानियों से सराबोर होती हुई पर्वतों से दौड़ती गंगा इस स्थान पर बैठकर त्रिवेणी कहलाती है। त्रिवेणी याने गंगा, यमुना, सरस्वती का संगम। लेकिन मेरे लिए ये एक नदी का किनारा था जिस पर साधु-संत, भिखारियों की पंक्तियां और सामान्य लोग दिखाई देते। कुछेक प्रतिष्ठान उस पतली सी गली में आस-पास थे। कहीं गुड़िया के गुलाबी बाल एक डण्डे पर बँधे एक कन्धे के सहारे पूरा शहर घूमते जिन्हें देख मन ललचाता । चार पैरों पर खड़े खोखे जैसी संरचना के भीतर संतरे की टॉफियाँ प्लास्टिक के डब्बों से मेरे मुख की लार को आकर्षित करती।  सोडा वाली बोतलें जिसके मुख पर कंचा तैरता था, चाट-पकौड़ियों की कुछ ठेलियों के साथ खाने-पीने के शौकीन लोगों का इंतज़ार में चमकती रहती। कुछ अन्य दुकानें भी थी एक दुकान में फोटोग्राफर फ़ोटो खींचने का काम करता। फ़ोटो को एक बार में क्लिक करवाना उसकी जिम्मेदारी थी। एक दिन जब हम भाई-बहिन को उस दुकान के भीतर फ़ोटो खींचने एक बेंच पर बैठाया गया तो उसने हमें एक प्लास्टिक की गुड़िया दी उसके बाद 'आहा...आहा' करके हमारी गर्दन उठवाने की कोशिश में उसने बड़ी देर में एक फोटो निकाली। 


एक दिन याद आता है जब मैं चार साल की थी और मेरे पिता ने मेरी उम्र पाँच वर्ष लिखवा मेरा दाखिला करवाया। एक वर्ष वरिष्ठ तो मैं उसी दिन हो चुकी थी ये काफी बड़ी उपलब्धि रही क्योंकि आज भी अपनी इस उपलब्धि पर मैं मौन रहना स्वीकार करती हूँ क्योंकि स्त्री जाति पर वैसे भी उम्र का प्रभाव ज्यादा ही हो जाता है। राजकीय नियमों में हाई स्कूल के दस्तावेज बड़े महत्वपूर्ण हैं । उन पर जन्म दिनाँक अंकित हो जाये तो इसे गलत सिद्ध करना दुर्लभ है याने आज दसवीं के प्रमाण पत्र सही नहीं हो सकते या कहे कि वो साल जो मैंने जिया ही नहीं मेरा साथ कभी नहीं छोड़ेगा । खैर इसके कतिपय फायदे लौटती ज़िंदगी में शायद कुछ हो जाये। बच्चे के स्कूल जाने के प्रथम दिवस में काफी विशेषताएं होती हैं । परिवार से बाहर दुनिया में पहला कदम। कितनी अंजानी सी राह...पेड़ की छांव को छोड़ते पंछी की तरह। 


               मुझे आज भी वो दिवस बखूबी याद है। हमारे घर में एक पुरानी सी साईकल थी "एटलस" कंपनी की उस साइकिल के डण्डे पर आगे एक गद्दी लगी थी । उस साईकल में आगे बैठकर अपने स्कूल की सवारी बहुत दिनों तक की। साईकल जीवन को सुगमतापूर्ण जीने का एक साधन था । मेरे लिए तो वो मर्सीडीज ही थी । चार सौ की इस साईकल में वो संतोष था जो आजकल जीप कंपास , औडी की गाड़ियों में भी नहीं मिलता। अधिकतर लोगों को इनकम टैक्स वालो का भय अलग दिल का मरीज भी नहीं बनाता था। साईकल के ज़माने की भी अपनी यादें हैं । हर घर में साईकल को रोज़ चमकाया जाता था और फिर वो भी बड़े रौब में चलती थी। अपने स्कूल की पहली बार यात्रा इसी में बैठकर की जानी थी। माँ ने बड़े प्रेम से सांवले रंगत पर मेरी बड़ी बड़ी आँखों मे काजल लगाया । आंखों को पार करता काजल । फिर मेरे पिता ने मुझे उस साइकिल पर आगे गद्दी में बिठा स्कूल के बाहर उतारा।


             मुझे उस अजनबी जगह में 'घर' नहीं दिखा ये मेरे लिए बड़ा अप्रत्याशित रहा । मैंने वहाँ रौद्र रूप में तेज स्वर में रोना शुरू किया। वैसे भी बालहठ से बड़ी कोई चीज़ नहीं होती । ये कृत्य कुछ ज्यादा ही प्रभावी रहा होगा क्योंकि मुझे याद है कि मेरे पिता ने गुस्से में मेरा हाथ पकड़ कर ज़बरदस्ती स्कूल की तरफ धकेला। मैं ज़मीन पर गिर गयी। प्रतिमा मैडम मुझे लेने आई थी और वो मुझे देखती ही रह गयी। मैं वापिस घर आ गयी। उसके बाद मुझे बाथरूम में बंद करवाकर स्कूल जाने के लिए हाँ करवाई गई ठीक जैसे निकाह होने पर जबरन हाँ करवाई हो और फिर उसी दिन दोबारा अपनी आंखों को काजल में सना मैं स्कूल गयी प्रतिमा मैडम ने टॉफ़ी देकर मुझे चुप कराया और अंदर ले गयी लेकिन सच कहूँ तो उस समय मैं मैडम से नज़रें नही मिला पा रही थी। उनके सामने अपमान जो हो गया था। वो मेरी पहली अध्यापक थी जिनके बारे में काफी दिनों में मालूम हुआ कि घरेलू समस्त ज़िम्मेदारियों को निभाने हेतु उन्होंने विवाह नहीं किया।आज सोंचती हूँ उस वक़्त का सामाजिक मूल्य का कितना कठिन कदम उन्होंने उठाया था। स्कूल की उस पहली घटना के बाद आज दिवस तक किसी भी मौसम या हालात में मैंने कोई कक्षा ज़िद की वजह से कभी नहीं छोड़ी।


Thursday, 20 May 2021

2. अबोध मन के स्मृतिचित्र


मेरे बड़े भाई का जन्म मेरे होने से साढ़े तीन साल पहले हो चुका था। उसका नाम बॉबी था जो अपभ्रंश होकर बब्बी हो गया था। मैंने भी उसे इसी नाम से पुकारा जिस कारण कई बार मुझसे उसका झगड़ा होता। अक्सर मुझसे कहता कि वो मुझसे साढ़े तीन साल बड़ा है इसलिए मुझे उसे भैया संबोधन करना चाहिए। उस समय भूरे रंग का एक रेंगता हुआ कीड़ा ज़मीन पर दिखाई देता था। उसके बहुत सारे पैर थे। उस्का असल नाम कानखजूरा था। ये शब्द कठिन था इसलिए अशुद्ध रूप 'कानकनिच्छा' ही मेरी जुबान पर चढ़ा। मुझे वो बेहद गंदा और डरावना लगता। इसलिए मैंने अपने बड़े भाई का निक नेम 'कानकनिच्छा' रख दिया। हम साथ-साथ खेलते । एक बार हम दोनों आँगन में खेल रहे थे। एक मोटा सा चींटा भी ज़मीन पर घूम रहा था।

 " क्या तू इसको पकड़ सकती है? देख मैं इसे कैसे पकड़ता हूँ।" भाई ने अपने हाथ के अंगूठे और तर्जनी का प्रयोग कर पिछले हिस्से से उसे पकड़ा फिर ज़मीन पर छोड़ दिया। मैंने भी अपनी नन्हीं सी बुद्धि से अगले हिस्से से चींटे को पकड़ा जिसके परिणामस्वरूप उसने मुझे डंक मारा और पूरे आँगन में खून के छींटे बिखर गए। 


 दिमाग़ की संरचना के भीतर बहुत सी घटनाओं की स्मृतियाँ यादों की तहों में जीवंत रहती हैं। उन्हीं घटनाओं में से कुछ- कुछ यादें मेरे अंतस की नदी में क्रीड़ा करती हैं। ऐसी ही एक याद में सरकारी अस्पताल का एक कमरा दिखता है, जिसमें एक लोहे के पाइप वाला पलंग मुख्य द्वार वाली दीवार पर बनी एक खिड़की के सानिध्य में लगा था, जिस पर मेरी माँ लेटी थी । मैं बेहद छोटी थी शायद तीन वर्ष से कुछ दिन अधिक ...उम्र इसलिए निश्चित है क्योंकि मेरे ओर मेरे छोटे भाई में इतनी अवधि का अंतर है। वो कमरा कितना बड़ा था, ये कहना भी मुश्किल है क्योंकि नन्हीं आयु की आँखे सिर्फ़ घटनाक्रम देख पाती हैं आकार व वस्तु की परिसीमाएँ नहीं। सारे दरवाज़े व खिड़कियों का रंग पीला था। कमरे की अधिकतर चीज़े या तो सफ़ेद थी या फिर हरी। सफेद पलंग था और हरे रंग के पर्दे दरवाज़े पर लहरा रहे थे। मेरे पिता ने मेरा कौन सा हाथ पकड़ा था ये तो याद नहीं लेकिन कुछ लोग माँ को आपरेशन के लिए अंदर ले जा रहे थे। आपरेशन के बारे में उस समय जानकारी नहीं थी। कुछ देर बाद एक नन्हा सा शिशु जादुई अवतरण लेकर मेरे समक्ष आ चुका था। 

मैंने अपने पिता से पूछा, " ये कहाँ से मिला?"

उन्होंने मुझे बताया कि डॉक्टर ने अस्पताल से दिया। मेरे मन में भी यकीन घर कर गया कि अस्पताल से बच्चे मिलते हैं। इस बात पर मेरा यकीन तब तक बना रहा जब तक कि मेरी एक सहेली ने ये नहीं बताया कि उसकी माँ के पेट से डॉक्टर ने आपरेशन करके उसके भाई को निकाला था। 


कुछ बरसों बाद मैं इस अस्पताल में दोबारा गयी...लगभग नौ या दस साल की उम्र में। नीले रंग का अम्ब्रेला सूट पहना हुआ था जिसमें कुछ कीड़ेनुमा आकृतियाँ लाल -बैंगनी से रंग में बनी थी। मुझे बुख़ार था। चलने का मन भी नहीं हो रहा था फिर भी रास्ते में कई चित्र मजबूरन दिखने को मिल रहे थे।अस्पताल की पीले रंग की इमारत के गलियारे में कई लोग बैठे थे। अधिकांशतः सिर पर पल्ला रखे हुए युवतियाँ

 व प्रौढ़ महिलाएं रोते हुए बच्चों को संभाल रही थी, पुरुषों के भी बहुत से वर्ग थे, जिसमें से कुछ बाहर प्रांगण में जाकर तेंदुवे की पत्तियों का सदुपयोग करके धुँए के बादल अपने नाक व मुख से निकाल रहे थे। मुझे धुँए की गंध उबकाई दिला रही थी। लेकिन डॉक्टर के पास पहुँचने के लिए पैदल चलना मजबूरी थी। उस समय तक प्राइवेट अस्पताल का अधिक चलन नहीं था और पैसे की हैसियत सरकारी तरीकों में ही वर्चस्व प्राप्त कर सकती थी। इस सरकारी अस्पताल में चिकित्सक अपने काम के प्रति बेहद वफादार रहते थे। अमीर व गरीब सभी तबके के लोग दूर-दूर से चिकित्सक की सत्यनिष्ठा व उपचार की प्रसिद्धि के कारण इलाज कराने आते।

1990 के दशक का पूर्वार्द्ध था। वैश्विक पटल पर पूंजीवाद व साम्यवाद के नए समीकरण बन रहे थे। यू0एस0एस0आर0 जो भारत का सर्वप्रिय मित्र था वह संकट झेल रहा था। भारत भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण की नीतियों का हिस्सा बनने के करीब था। उस समय एक दुबली सी लड़की उस सरकारी अस्पताल में बड़ी कठिनाई से पैदल चलकर डॉक्टर के कमरे तक आयी थी। डॉक्टर ने पैंट व कमीज़ के ऊपर एक सफ़ेद आधी बाँह का कोट पहना था और स्टेथेस्कोप की दोनों बाहें डॉक्टर की गर्दन से लिपटी थी। एक पतला से चश्मा लगा था जो नाक की नोक पर टिका था । मोटी सी भौहों को ऊपर - नीचे कर वह बात कर रहे थे। डॉक्टर की कुर्सी व मेज के साथ मरीज के बैठने के लिए एक स्टूल था जिसके ऊपर स्टील की थाली जैसी आकृति हिलती सी दिख रही थी। सारे कमरे में डेटॉल की गंध फैली हुई थी। डॉक्टर साहब हर मरीज़ को देखकर अपने हाथ एक कटोरे में रखे डेटॉल के पानी मे डुबोते फिर दूसरे मरीज को देखते। वह सामान्य डील- डौल के व्यक्ति थे उनके चेहरे पर आत्मविश्वास झलकता था। उनकी काली मूँछे बड़ी थी आवाज़ में भारीपन था। 


मुझसे पहले एक ग्रामीण महिला अपने बच्चे को लेकर उस थालीनुमा स्टूल पर बैठ गयी। उसने अपने बच्चे की बहती हुई नाक को अपने दाएं हाथ के अँगूठे व अनामिका से पकड़ लगभग नोचते हुए उस श्लेष्मयुक्त पदार्थ को अपनी दाईं ओर की दीवार में सजा दिया। उसकी ये हरकत वहाँ खड़े सभी लोगों ने देखी। 

इस क्रिया के उपरांत डॉक्टर साहब ने विनोदी व तेज स्वर में उससे कहा, " वहाँ क्यों पोछा तुमने? मेरे इस कोट में पोछ देती। कैसे हो यार तुम लोग....बताओ क्या तकलीफ है बच्चे को? "

" डॉक्टर साब। बुखार नहीं उतर रहा। " उस महिला ने कहा।

डॉक्टर ने कुछ पर्चे में लिखकर उसे जाँच हेतु भेजते हुए कहा,

" ये जाँच करवा के दिखाओ मुझे।"

उसके बाद मेरा नंबर आया। डॉक्टर ने मुझसे पूछा,

"बेटा क्या परेशानी है? बताओ।" 

"बुखार है।" मैंने कहा। 

डॉक्टर ने अपने स्टेथेस्कोप को कान में टिकाकर सिक्केनुमा आकृति को मेरे सीने पर लगाया । अपने हाथों से मेरी दोनों आंखों के नीचे वाली बॉरोनियों के भीतर झाँका फिर मुझे पीछे घूमने को कहा। 

मुझे ऐसा घूमने वाला स्टूल कभी नहीं मिला था मैं बुख़ार की पीड़ा को भूल उसमें मज़े से घूमने लगी। इस अवधि में डॉक्टर ने पर्चा लिखकर पिता को दिया। मेरा दिमाग़ उसी स्टूल में वापिस घूमने को लालायित होने लगा...खून की जाँच कराई गई व डॉक्टर ने ग्लूकोस चढ़ाने के लिए एक वार्ड में भेज दिया। वार्ड में अंदर जगह नहीं थी बाहर के बरामदे में एक बेड लगाया गया और हाथ में सुई को घोपकर वो उपकरण फिट किया गया। उस उबाऊ समय में उस बोतल से बूँद टपकती हुई देखती रही। रिपोर्ट में मलेरिया की पुष्टि हुई और रोज़ एक ग्लूकोज़ की बोतल चढ़ाने मुझे उस अस्पताल ले जाया गया। कोई 'पाइलोबैक्ट किट' के साथ कड़वी सी दवा थी ऐसी बेस्वाद दवा दोबारा कभी नहीं चखी। ठीक होने पर आखिरी दिन डॉक्टर के उस स्टूल पर मैं बैठ पाई थी। उसके बाद जब भी मैं बीमार हुई उस अस्पताल में नहीं गयी । एक नए सरकारी अस्पताल का निर्माण हो चुका था .... पुरानी यादें पीली दीवारों के साथ युगलबंदी कर सो चुकी थी।

 ये यादें बमुश्किल तीस बरस पहले की हैं वो सड़क आज भी उसी रास्ते से गुजरती है बस अभी थोड़ी चौड़ी हो चुकी है । सड़क का ये विस्तार जनसँख्या के बढ़ते कदमों से हुआ लगता है। उस समय आज की तरह सड़कों पर निज संपत्तियों का एकाधिकार नहीं दिखता था। सड़क के ऊपर सार्वजनिक वाहन व गिने-चुने निजी वाहन दौड़ते थे । निजीकरण, उदारीकरण व भूमंडलीकरण के बीच का संक्रमण काल मेरे सामने से गुज़र रहा था। कई परिवर्तन अपनी बारी का इंतज़ार करने को उत्सुक थे। मेरा जन्म वर्ष 1981 के उत्तरार्द्ध में हुआ। धरती पर उस वक़्त तीन से साढ़े तीन किलो की ये रचना कुछ दिनों बाद से अपनी दो आँखों के साथ दुनिया को बिना किसी समझ के देख रही थी। सामाजिक मान्यताएं, रूढ़ियों वाले उस समाज में शायद ही किसी ने चोगे वाले फ़ोन से अधिक कोई कल्पना की होगी। किसी मासूम से बच्चे की जीवन यात्रा में उसके परिवार के संस्कारों से अधिक उसके समाज की मान्यताएं पहले स्थापित होती हैं। 


ऐसे ही एक स्मृति पिता की गोद में रोने की है। उम्र शायद चार से पाँच साल। हम किसी के घर पर थे और मेरा रोना जाने किस कारण था। बार - बार कुछ स्वर मुझे चुप कराते।

 "बड़ी - बड़ी आंखों वाला बच्चा क्या खायेगा?" एक कहता।

"चलो आओ घुम्मी चलें।" कोई दूसरी आवाज़ होती। 


जब मेरी अप्रत्याशित चीख नहीं रुकी तो सम्यक् विचारोपरांत मतैक्य स्थापित किया गया कि मुझे किसी की नज़र लगी है व किसी अच्छे जानकार आदमी से नज़र उतारनी होगी । हम घर आए घर की दहलीज़ आने से पहले ही आकस्मिक रूप से मेरा रुदन बन्द हुआ और घर आकर मुझे मेरे दूसरे के घर रोने के कारण बहुत डाँटा गया लेकिन ये भी याद आता है कि मुझे नज़र उतारने के लिए तत्समय जाने- माने सिद्धहस्त पुरुष के पास ले जाया गया। जिसका नाम, राम के नाम से शुरू होता था .... रामभरोसे या फिर रामअवतार। याद नहीं किंतु राम में मिलकर ही बना था। वो या तो रात थी या प्रातः होने से पूर्व का अंधेरा लेकिन चाँद आकाश से पृथ्वी की ज़मीन को घूर रहा था। मेरे पिता हीरो साईकल में हैंडिल के आगे की गद्दी में बैठाकर मुझे उसके पास ले गए थे । उसका घर पास ही था।

"राम ....... दरवाजा खोल, ज़रा लड़की की नज़र उतारनी है।" उसके दरवाज़े पर खटखटाकर पिता ने आवाज़ लगाई।

"हौ... आया।" वो दरवाज़े से बाहर आया।

इस सिद्धहस्त पुरुष के दर्शन से पहले मैंने शिवरात्रि के मेले में जादूगर देखे थे जो मुख से कुछ फुसफुसाकर कहते और पंखों के रंग बदल जाते। मुझे वो आदमी भी जादूगर ही लगा। हालाँकि उसकी वेशभूषा में काले कोट पैंट व टोपी का मिश्रण नहीं था उससे उलट वह एक सफ़ेद बनियान और सफ़ेद धोती पहने थोड़ा झुककर रहस्यमयी मुद्रा में उस कुटिया से बाहर आते दिखाई दिया । 

इस राम के नाम वाले आदमी की कद - काया सामान्य थी एक पतला या कहे मरियल श्रेणी में रखे जाने वाला व्यक्ति, जिसे अपनी नज़र उतारने वाली विद्या पर गुरुर था। ये एक सामान्य सी बात मानी जा सकती है क्योंकि भारतीय परिवेश में झाड़-फूँक व धर्म को विज्ञान से आगे ही माना जाता है। आस्था व विज्ञान की राहें अलग कर दी जाती हैं। फिर वह नाम में ही राम नाम के साथ अवतरित हुआ था और मात्र नज़र उतारने के गुर से समाज के सभी वर्गों व वर्णों में प्रसिद्धि पा सकता था इसलिए उसने भेड़ो को चराने के अलावा ये दूसरा व्यापार खोला था। ये उसकी अतिरिक्त कमाई का भी साधन था। 


निश्चित तौर पर मेरे घर में भी यही व्यवस्थाएं थी जिसका परिणाम यह था कि मुझे 'राम' के द्वार पर लाया गया था। चाँद की रोशनी इतनी थी कि हम लोग एक दूसरे के काले साए देख सकते थे। उसने ज़मीन से एक पत्थर उठाया व मिट्टी में एक गोला बनाया और मुझसे कहा,

" इहाँ बैठ जाओ बिटिया।" 

मैं चुपचाप उस गोले के भीतर बैठ गयी। मेरा मुख उसके सामने था । वह कुछ बुदबुदाया और फिर आखिरी बार उसने वो पत्थर अपने पीछे फेंक दिया।

" चलो उठ जाओ बिटिया। " उसने कहा।

पिता की और देखकर उसने कहा,

"पण्डित जी , बड़ी तेज़ नज़र लगी थी। अब सब ठीक हो जाएगा। दो दिन और झाड़ना पड़ेगा तभी असर होगा।"


बिना किसी तार्किक विश्लेषण के मुझे अगले दो दिन उसके पास ले जाया गया। उस दिन लगा कि कुछ बातों के प्रश्न नहीं होते। उस समय बच्चों पर बहुत नज़र लगती थी।  मेरा रंग गेंहुवे से साँवले रंग में चमकता था। मुझे नहीं लगता कि सौंदर्य नज़र लगने का कारक होता होगा। आस -पास के कई बच्चे काले- गोरे रंग के दिखते लेकिन 'नज़र' बिन किसी विशेष आकर्षण के सबसे समान व्यवहार करती। नज़र लगने की मान्यताओं को पोषित करने हेतु राम भरोसे या राम अवतार जैसे लोग थे ही....जब पढ़े-लिखे लोग बच्चों को काला टीका, धागा व नजरिया में बांध रहे थे तो फिर मेरे घर में इस बात पर कौन प्रश्न करता। ये कहना ज्यादा सुलभ है कि पढ़े-लिखे व अनपढ़ लोगों की दृष्टि में नज़र की मान्यता वैज्ञानिक कारणों से विमुख एक सामाजिक मूल्य था।


Wednesday, 19 May 2021

1. पिता पर्वत की गोद

मेरी जीवन यात्रा, एक छोटी सी बेल पर खिले हुए पुष्प जितनी महत्वपूर्ण है। फूल खिलता है फिर धीरे - धीरे मुरझा जाता है। सारी चीज़ें पुरानी होकर खत्म होती हैं। ये सृष्टि का नियम है। मेरे होने का इतिहास मुझे ही लेखबद्ध करना है। कागज़ के युग भी जाता दिखाई देता है। डिजिटल कागज़ और स्याही भविष्य में किस रूप में होगी ये विचार मेरे जीवन के समय से कोसों दूर है। मैं तो उस समय की बात लिख सकती हूँ जो मुझे छूकर गुज़रा है। मेरा अपना समय जो नश्वर होता गया पुरानी होती चीज़ों की तरह। 

मेरा रिश्ता हिमालय से अनायास ही हो गया। उसके ही पहाड़ों में मेरे जीवन की डोर थमी। हिमालय के उस हिस्से का नाम था टिहरी गढ़वाल, जिसके एक गाँव मे मेरे दादा जी का भी एक घर था । दादाजी का नाम पुरुषोत्तम दत्त बंगवाल था। वे पूजा- पाठ का काम करते थे। उन्होंने खेती, पूजा-पाठ करने वाले लोगों के मध्य अपना अधिकांश जीवन बिताया इसलिए उनकी दुनिया उतनी बड़ी ही थी जितनी सिकंदर के समय सिकंदर की। फिर ऐसा होना लाज़मी भी था। जब दूरस्थ स्थानों में  किताबों का विज्ञान कोसो दूर हो । रोटी, कपड़ा, मकान का संघर्ष मिट्टी से मिलता हो। मोबाइल व टेलीविजन भविष्य की झोली में झूल रहा हो। सिर्फ़ बम फेंकने वाले देश के रूप में रेडियो पर अमेरिका का नाम सुनाया जा रहा हो और रेडियो की उपलब्धि विशिष्ट उच्च वर्ग की पहचान हो। ऐसे में दुनिया उसी स्थान के चारों ओर तक सीमित रह जाती है। 

दादाजी के लिए भी अधिक पढ़ा-लिखा होना अधिक महत्वपूर्ण नहीं था। मेरी बुआएं पढ़ी-लिखी नहीं थी। पुत्र होने के कारण मेरे पिता व चाचा को पढ़ने का अवसर मिला। मेरे पिता मेरे दादा जी से अधिक सज्जन स्वभाव के थे। आठवीं दर्जे तक पढ़ाई करने के बाद उन्होंने कई प्रकार के काम सीखे। जैसे बिजली के तारों का काम, लकड़ी का काम, रंग-रोगन का काम, मिस्री का काम। ऐसी लगनशीलता कहाँ से उनके अंदर आयी ये कहना मुश्किल है। उन्नीस या बीस वर्ष की आयु से वह ऋषिकेश आ गए व सरकारी महकमे में एक छोटी सी नोकरी करने लगे। वहीं दो कमरों के सरकारी आवास में सपत्नीक रहने लगे। मैं दो भाइयों के मध्य की संतान रही।

मेरे पिता बहुत शांत स्वभाव के व्यक्ति थे। मैंने कभी उन्हें बहुत अधिक बातें करते नहीं देखा । न ही दिल खोलकर हँसते देखा। अक्सर कई बार मैं हँसते - हँसते ज़मीन पर गिर जाती तब भी उनके मुख पर दंतपंक्ति नहीं दिखती थी। शायद उन्हें अपने जीवन का बेहद संतोष था शायद ही उनके कारण किसी को कभी कोई कष्ट हुआ हो। मेरे पिता का नाम लोकानन्द  था । लोगों में मान्यता है कि व्यक्ति का नाम उसके व्यक्तित्व पर प्रभाव डालता है। वैज्ञानिक रूप से ये भले सत्य न हो किन्तु उनके साथ ये सत्य ही लगता था। 

सदियों पहले वर्तमान उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्र की कल्पना एक घने दुर्लभ प्रदेश की भाँति की जा सकती है। अंग्रेजों की व्यवस्थाओं व अशोक के शिलालेख से कहीं पहले । पौराणिक मिथकों से कहीं पूर्व इस भूभाग में बसावट की शुरुवात हुई। मौलिक जातियों के बीच मैदानी क्षेत्रों की जातियाँ स्थापित हुई।  माना जाता है कि कुमाऊँ क्षेत्र के लोग मध्य भारत की धरती से यहाँ आए। गढ़वाल क्षेत्र के लोगों के बारे में भी मान्यता है कि महाराणा प्रताप के वंशज इस पहाड़ी क्षेत्र में आए और यहीं बस गए। साहित्यकार भी भाषा, बोली आधार पर विभिन्न मानक स्थापित करते रहे। 

मनुष्य की वंशावली का प्रयोग मात्र ऐतिहासिक तथ्यों की पूर्ति करने हेतु प्रसंशनीय होते हैं। वंशावली व डी0एन0ए0 में एकरूपता स्थापित नहीं की जा सकती। करोड़ो वर्षों से हमारे खून का मिश्रण होता रहा और आगे भी होता रहेगा। मानवीय उन्नयन में जाने मेरे पूर्वज अंध महाद्वीप से आये हों या फिर मध्य एशिया से। मानव के विभिन्न संकरणों से गुजरते हुए मेरा भी उद्भव हुआ। चूँकि समाज में कुल व गोत्र परम्पराराएँ प्रासंगिक रहती हैं इसीलिए मेरे मन में भी विचार आया कि मैं अपने कुल के प्रथम पुरुष तक पहुँच पाऊँ। एक दिवस मेरे दादा जी से मैंने ये प्रश्न पूछा तो दादा जी के दादा जी तक ये क्रम पहुँच सका उससे अधिक जानकारी उन्हें नहीं थी।


एक बार मैंने अपने पिता से पूछा, " ब्राह्मण में इतनी जातियाँ क्यों हैं?"

" हमारा गोत्र भारद्वाज है। गढ़वाल में कई जातियाँ है। ब्राह्मणों के प्रकार है। सरोला व गंगाड़ी ब्राह्मण होते हैं।" पिता ने कहा।


"हम कौन से ब्राह्मण हैं?" मैंने प्रश्न किया।


" बंगवाल जाति गंगाड़ी ब्राह्मण में आते हैं। ये लोग पर्वत की तलहटी में रहते हैं । गंगाड़ी के अलावा सरोला ब्राह्मण भी पहाड़ में रहते हैं । सरोला पर्वतों की चोटियों पर रहते हैं। अब चूँकि ये राजदरबार के ब्राह्मण रहे तो उत्सवों में इनके द्वारा ही भोजन बनाया जाता है।" उन्होंने कहा।


"तो फिर क्या पर्वतों के ऊपर बसने से या फिर राजा की रसोई बनाने से ये श्रेष्ठ हैं?" मैंने पूछा।

" नहीं , यदि ऐसा होता तो सरोला व गंगाड़ी आपस मे वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं करते। गोत्रों में समानताएं मिलती हैं। बंगवालों का गोत्र भारद्वाज है। " उन्होंने कहा।


दरअसल मेरी जाति के लोग मध्यप्रदेश से गढ़वाल के बांगा गांव में बसे थे। हालाँकि साहित्यकार व स्थानीय तथ्यों में मतभेद मिलते हैं । जो भी सत्य रहा हो किन्तु संसार के किसी भी भूभाग पर एक सदी रहने के बाद मूल निवासी का दर्जा मिल जाता है। मनुष्य के सौ बरस के औसत जीवन में वंशावली का महत्व इतिहास जानने के लिए ज़्यादा आवश्यक है बनिस्पत रंग, जाति, धर्म के मानकों का महिमामण्डन करने के। इसके बावजूद नस्लों की छ्द्म विरासतें वंशो में जन्म लेने के नाम पर आत्मगौरान्वित होती हैं ।

वंशावली के नाम जैविक गर्भ के अतिरिक्त अन्य संदर्भ साक्ष्य से सिद्ध नहीं किए जा सकते। इसके बावजूद विभिन्न सामाजिक वंशावलियों में शुद्धता के मानक स्पष्ट किए जाते हैं। विकासवादी सिद्धान्त में इस प्रकार की व्यवस्थाओं से धर्म, क्षेत्र व जाति आधार पर बहुत से समाज स्थापित हैं। वंशावली में अक्सर एक 'सर नेम' की परंपरा होती है जिस कारण मुझे भी 'बंगवाल' सर नेम विरासत में मिला। इससे मुझे कुछ उपलब्धियां अनायास से हुई। जैसे मेरे नाम से ब्राह्मण व उत्तराखण्ड मूल स्वतः परिभाषित हुआ।



||9|| स्नेहा और गणित -दो

उसका नाम स्नेहा गुप्ता था। उसका पूरा व्यक्तित्व बेहद प्रभावित कर देने वाला था। उसके काले रेशमी बाल बेहद घने थे जो बड़ी मुश्किल से जबरन किसी ब...