मेरे बड़े भाई का जन्म मेरे होने से साढ़े तीन साल पहले हो चुका था। उसका नाम बॉबी था जो अपभ्रंश होकर बब्बी हो गया था। मैंने भी उसे इसी नाम से पुकारा जिस कारण कई बार मुझसे उसका झगड़ा होता। अक्सर मुझसे कहता कि वो मुझसे साढ़े तीन साल बड़ा है इसलिए मुझे उसे भैया संबोधन करना चाहिए। उस समय भूरे रंग का एक रेंगता हुआ कीड़ा ज़मीन पर दिखाई देता था। उसके बहुत सारे पैर थे। उस्का असल नाम कानखजूरा था। ये शब्द कठिन था इसलिए अशुद्ध रूप 'कानकनिच्छा' ही मेरी जुबान पर चढ़ा। मुझे वो बेहद गंदा और डरावना लगता। इसलिए मैंने अपने बड़े भाई का निक नेम 'कानकनिच्छा' रख दिया। हम साथ-साथ खेलते । एक बार हम दोनों आँगन में खेल रहे थे। एक मोटा सा चींटा भी ज़मीन पर घूम रहा था।
" क्या तू इसको पकड़ सकती है? देख मैं इसे कैसे पकड़ता हूँ।" भाई ने अपने हाथ के अंगूठे और तर्जनी का प्रयोग कर पिछले हिस्से से उसे पकड़ा फिर ज़मीन पर छोड़ दिया। मैंने भी अपनी नन्हीं सी बुद्धि से अगले हिस्से से चींटे को पकड़ा जिसके परिणामस्वरूप उसने मुझे डंक मारा और पूरे आँगन में खून के छींटे बिखर गए।
दिमाग़ की संरचना के भीतर बहुत सी घटनाओं की स्मृतियाँ यादों की तहों में जीवंत रहती हैं। उन्हीं घटनाओं में से कुछ- कुछ यादें मेरे अंतस की नदी में क्रीड़ा करती हैं। ऐसी ही एक याद में सरकारी अस्पताल का एक कमरा दिखता है, जिसमें एक लोहे के पाइप वाला पलंग मुख्य द्वार वाली दीवार पर बनी एक खिड़की के सानिध्य में लगा था, जिस पर मेरी माँ लेटी थी । मैं बेहद छोटी थी शायद तीन वर्ष से कुछ दिन अधिक ...उम्र इसलिए निश्चित है क्योंकि मेरे ओर मेरे छोटे भाई में इतनी अवधि का अंतर है। वो कमरा कितना बड़ा था, ये कहना भी मुश्किल है क्योंकि नन्हीं आयु की आँखे सिर्फ़ घटनाक्रम देख पाती हैं आकार व वस्तु की परिसीमाएँ नहीं। सारे दरवाज़े व खिड़कियों का रंग पीला था। कमरे की अधिकतर चीज़े या तो सफ़ेद थी या फिर हरी। सफेद पलंग था और हरे रंग के पर्दे दरवाज़े पर लहरा रहे थे। मेरे पिता ने मेरा कौन सा हाथ पकड़ा था ये तो याद नहीं लेकिन कुछ लोग माँ को आपरेशन के लिए अंदर ले जा रहे थे। आपरेशन के बारे में उस समय जानकारी नहीं थी। कुछ देर बाद एक नन्हा सा शिशु जादुई अवतरण लेकर मेरे समक्ष आ चुका था।
मैंने अपने पिता से पूछा, " ये कहाँ से मिला?"
उन्होंने मुझे बताया कि डॉक्टर ने अस्पताल से दिया। मेरे मन में भी यकीन घर कर गया कि अस्पताल से बच्चे मिलते हैं। इस बात पर मेरा यकीन तब तक बना रहा जब तक कि मेरी एक सहेली ने ये नहीं बताया कि उसकी माँ के पेट से डॉक्टर ने आपरेशन करके उसके भाई को निकाला था।
कुछ बरसों बाद मैं इस अस्पताल में दोबारा गयी...लगभग नौ या दस साल की उम्र में। नीले रंग का अम्ब्रेला सूट पहना हुआ था जिसमें कुछ कीड़ेनुमा आकृतियाँ लाल -बैंगनी से रंग में बनी थी। मुझे बुख़ार था। चलने का मन भी नहीं हो रहा था फिर भी रास्ते में कई चित्र मजबूरन दिखने को मिल रहे थे।अस्पताल की पीले रंग की इमारत के गलियारे में कई लोग बैठे थे। अधिकांशतः सिर पर पल्ला रखे हुए युवतियाँ
व प्रौढ़ महिलाएं रोते हुए बच्चों को संभाल रही थी, पुरुषों के भी बहुत से वर्ग थे, जिसमें से कुछ बाहर प्रांगण में जाकर तेंदुवे की पत्तियों का सदुपयोग करके धुँए के बादल अपने नाक व मुख से निकाल रहे थे। मुझे धुँए की गंध उबकाई दिला रही थी। लेकिन डॉक्टर के पास पहुँचने के लिए पैदल चलना मजबूरी थी। उस समय तक प्राइवेट अस्पताल का अधिक चलन नहीं था और पैसे की हैसियत सरकारी तरीकों में ही वर्चस्व प्राप्त कर सकती थी। इस सरकारी अस्पताल में चिकित्सक अपने काम के प्रति बेहद वफादार रहते थे। अमीर व गरीब सभी तबके के लोग दूर-दूर से चिकित्सक की सत्यनिष्ठा व उपचार की प्रसिद्धि के कारण इलाज कराने आते।
1990 के दशक का पूर्वार्द्ध था। वैश्विक पटल पर पूंजीवाद व साम्यवाद के नए समीकरण बन रहे थे। यू0एस0एस0आर0 जो भारत का सर्वप्रिय मित्र था वह संकट झेल रहा था। भारत भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण की नीतियों का हिस्सा बनने के करीब था। उस समय एक दुबली सी लड़की उस सरकारी अस्पताल में बड़ी कठिनाई से पैदल चलकर डॉक्टर के कमरे तक आयी थी। डॉक्टर ने पैंट व कमीज़ के ऊपर एक सफ़ेद आधी बाँह का कोट पहना था और स्टेथेस्कोप की दोनों बाहें डॉक्टर की गर्दन से लिपटी थी। एक पतला से चश्मा लगा था जो नाक की नोक पर टिका था । मोटी सी भौहों को ऊपर - नीचे कर वह बात कर रहे थे। डॉक्टर की कुर्सी व मेज के साथ मरीज के बैठने के लिए एक स्टूल था जिसके ऊपर स्टील की थाली जैसी आकृति हिलती सी दिख रही थी। सारे कमरे में डेटॉल की गंध फैली हुई थी। डॉक्टर साहब हर मरीज़ को देखकर अपने हाथ एक कटोरे में रखे डेटॉल के पानी मे डुबोते फिर दूसरे मरीज को देखते। वह सामान्य डील- डौल के व्यक्ति थे उनके चेहरे पर आत्मविश्वास झलकता था। उनकी काली मूँछे बड़ी थी आवाज़ में भारीपन था।
मुझसे पहले एक ग्रामीण महिला अपने बच्चे को लेकर उस थालीनुमा स्टूल पर बैठ गयी। उसने अपने बच्चे की बहती हुई नाक को अपने दाएं हाथ के अँगूठे व अनामिका से पकड़ लगभग नोचते हुए उस श्लेष्मयुक्त पदार्थ को अपनी दाईं ओर की दीवार में सजा दिया। उसकी ये हरकत वहाँ खड़े सभी लोगों ने देखी।
इस क्रिया के उपरांत डॉक्टर साहब ने विनोदी व तेज स्वर में उससे कहा, " वहाँ क्यों पोछा तुमने? मेरे इस कोट में पोछ देती। कैसे हो यार तुम लोग....बताओ क्या तकलीफ है बच्चे को? "
" डॉक्टर साब। बुखार नहीं उतर रहा। " उस महिला ने कहा।
डॉक्टर ने कुछ पर्चे में लिखकर उसे जाँच हेतु भेजते हुए कहा,
" ये जाँच करवा के दिखाओ मुझे।"
उसके बाद मेरा नंबर आया। डॉक्टर ने मुझसे पूछा,
"बेटा क्या परेशानी है? बताओ।"
"बुखार है।" मैंने कहा।
डॉक्टर ने अपने स्टेथेस्कोप को कान में टिकाकर सिक्केनुमा आकृति को मेरे सीने पर लगाया । अपने हाथों से मेरी दोनों आंखों के नीचे वाली बॉरोनियों के भीतर झाँका फिर मुझे पीछे घूमने को कहा।
मुझे ऐसा घूमने वाला स्टूल कभी नहीं मिला था मैं बुख़ार की पीड़ा को भूल उसमें मज़े से घूमने लगी। इस अवधि में डॉक्टर ने पर्चा लिखकर पिता को दिया। मेरा दिमाग़ उसी स्टूल में वापिस घूमने को लालायित होने लगा...खून की जाँच कराई गई व डॉक्टर ने ग्लूकोस चढ़ाने के लिए एक वार्ड में भेज दिया। वार्ड में अंदर जगह नहीं थी बाहर के बरामदे में एक बेड लगाया गया और हाथ में सुई को घोपकर वो उपकरण फिट किया गया। उस उबाऊ समय में उस बोतल से बूँद टपकती हुई देखती रही। रिपोर्ट में मलेरिया की पुष्टि हुई और रोज़ एक ग्लूकोज़ की बोतल चढ़ाने मुझे उस अस्पताल ले जाया गया। कोई 'पाइलोबैक्ट किट' के साथ कड़वी सी दवा थी ऐसी बेस्वाद दवा दोबारा कभी नहीं चखी। ठीक होने पर आखिरी दिन डॉक्टर के उस स्टूल पर मैं बैठ पाई थी। उसके बाद जब भी मैं बीमार हुई उस अस्पताल में नहीं गयी । एक नए सरकारी अस्पताल का निर्माण हो चुका था .... पुरानी यादें पीली दीवारों के साथ युगलबंदी कर सो चुकी थी।
ये यादें बमुश्किल तीस बरस पहले की हैं वो सड़क आज भी उसी रास्ते से गुजरती है बस अभी थोड़ी चौड़ी हो चुकी है । सड़क का ये विस्तार जनसँख्या के बढ़ते कदमों से हुआ लगता है। उस समय आज की तरह सड़कों पर निज संपत्तियों का एकाधिकार नहीं दिखता था। सड़क के ऊपर सार्वजनिक वाहन व गिने-चुने निजी वाहन दौड़ते थे । निजीकरण, उदारीकरण व भूमंडलीकरण के बीच का संक्रमण काल मेरे सामने से गुज़र रहा था। कई परिवर्तन अपनी बारी का इंतज़ार करने को उत्सुक थे। मेरा जन्म वर्ष 1981 के उत्तरार्द्ध में हुआ। धरती पर उस वक़्त तीन से साढ़े तीन किलो की ये रचना कुछ दिनों बाद से अपनी दो आँखों के साथ दुनिया को बिना किसी समझ के देख रही थी। सामाजिक मान्यताएं, रूढ़ियों वाले उस समाज में शायद ही किसी ने चोगे वाले फ़ोन से अधिक कोई कल्पना की होगी। किसी मासूम से बच्चे की जीवन यात्रा में उसके परिवार के संस्कारों से अधिक उसके समाज की मान्यताएं पहले स्थापित होती हैं।
ऐसे ही एक स्मृति पिता की गोद में रोने की है। उम्र शायद चार से पाँच साल। हम किसी के घर पर थे और मेरा रोना जाने किस कारण था। बार - बार कुछ स्वर मुझे चुप कराते।
"बड़ी - बड़ी आंखों वाला बच्चा क्या खायेगा?" एक कहता।
"चलो आओ घुम्मी चलें।" कोई दूसरी आवाज़ होती।
जब मेरी अप्रत्याशित चीख नहीं रुकी तो सम्यक् विचारोपरांत मतैक्य स्थापित किया गया कि मुझे किसी की नज़र लगी है व किसी अच्छे जानकार आदमी से नज़र उतारनी होगी । हम घर आए घर की दहलीज़ आने से पहले ही आकस्मिक रूप से मेरा रुदन बन्द हुआ और घर आकर मुझे मेरे दूसरे के घर रोने के कारण बहुत डाँटा गया लेकिन ये भी याद आता है कि मुझे नज़र उतारने के लिए तत्समय जाने- माने सिद्धहस्त पुरुष के पास ले जाया गया। जिसका नाम, राम के नाम से शुरू होता था .... रामभरोसे या फिर रामअवतार। याद नहीं किंतु राम में मिलकर ही बना था। वो या तो रात थी या प्रातः होने से पूर्व का अंधेरा लेकिन चाँद आकाश से पृथ्वी की ज़मीन को घूर रहा था। मेरे पिता हीरो साईकल में हैंडिल के आगे की गद्दी में बैठाकर मुझे उसके पास ले गए थे । उसका घर पास ही था।
"राम ....... दरवाजा खोल, ज़रा लड़की की नज़र उतारनी है।" उसके दरवाज़े पर खटखटाकर पिता ने आवाज़ लगाई।
"हौ... आया।" वो दरवाज़े से बाहर आया।
इस सिद्धहस्त पुरुष के दर्शन से पहले मैंने शिवरात्रि के मेले में जादूगर देखे थे जो मुख से कुछ फुसफुसाकर कहते और पंखों के रंग बदल जाते। मुझे वो आदमी भी जादूगर ही लगा। हालाँकि उसकी वेशभूषा में काले कोट पैंट व टोपी का मिश्रण नहीं था उससे उलट वह एक सफ़ेद बनियान और सफ़ेद धोती पहने थोड़ा झुककर रहस्यमयी मुद्रा में उस कुटिया से बाहर आते दिखाई दिया ।
इस राम के नाम वाले आदमी की कद - काया सामान्य थी एक पतला या कहे मरियल श्रेणी में रखे जाने वाला व्यक्ति, जिसे अपनी नज़र उतारने वाली विद्या पर गुरुर था। ये एक सामान्य सी बात मानी जा सकती है क्योंकि भारतीय परिवेश में झाड़-फूँक व धर्म को विज्ञान से आगे ही माना जाता है। आस्था व विज्ञान की राहें अलग कर दी जाती हैं। फिर वह नाम में ही राम नाम के साथ अवतरित हुआ था और मात्र नज़र उतारने के गुर से समाज के सभी वर्गों व वर्णों में प्रसिद्धि पा सकता था इसलिए उसने भेड़ो को चराने के अलावा ये दूसरा व्यापार खोला था। ये उसकी अतिरिक्त कमाई का भी साधन था।
निश्चित तौर पर मेरे घर में भी यही व्यवस्थाएं थी जिसका परिणाम यह था कि मुझे 'राम' के द्वार पर लाया गया था। चाँद की रोशनी इतनी थी कि हम लोग एक दूसरे के काले साए देख सकते थे। उसने ज़मीन से एक पत्थर उठाया व मिट्टी में एक गोला बनाया और मुझसे कहा,
" इहाँ बैठ जाओ बिटिया।"
मैं चुपचाप उस गोले के भीतर बैठ गयी। मेरा मुख उसके सामने था । वह कुछ बुदबुदाया और फिर आखिरी बार उसने वो पत्थर अपने पीछे फेंक दिया।
" चलो उठ जाओ बिटिया। " उसने कहा।
पिता की और देखकर उसने कहा,
"पण्डित जी , बड़ी तेज़ नज़र लगी थी। अब सब ठीक हो जाएगा। दो दिन और झाड़ना पड़ेगा तभी असर होगा।"
बिना किसी तार्किक विश्लेषण के मुझे अगले दो दिन उसके पास ले जाया गया। उस दिन लगा कि कुछ बातों के प्रश्न नहीं होते। उस समय बच्चों पर बहुत नज़र लगती थी। मेरा रंग गेंहुवे से साँवले रंग में चमकता था। मुझे नहीं लगता कि सौंदर्य नज़र लगने का कारक होता होगा। आस -पास के कई बच्चे काले- गोरे रंग के दिखते लेकिन 'नज़र' बिन किसी विशेष आकर्षण के सबसे समान व्यवहार करती। नज़र लगने की मान्यताओं को पोषित करने हेतु राम भरोसे या राम अवतार जैसे लोग थे ही....जब पढ़े-लिखे लोग बच्चों को काला टीका, धागा व नजरिया में बांध रहे थे तो फिर मेरे घर में इस बात पर कौन प्रश्न करता। ये कहना ज्यादा सुलभ है कि पढ़े-लिखे व अनपढ़ लोगों की दृष्टि में नज़र की मान्यता वैज्ञानिक कारणों से विमुख एक सामाजिक मूल्य था।