Saturday, 29 May 2021

3. स्कूल का पहला दिन


    बचपन का संग...उसकी अमिट यादें बड़ी गहरी होती हैं।जाने दिमाग़ के हिस्सों में क्या-क्या समाता होगा। यादें मरती नहीं, तभी तो मन याद करता है।  मन के द्वारा समेटी हुई यादें, अच्छी या बुरी, चाहे जैसी भी हों, कीमती दौलत की तरह ताउम्र हमारे साथ रहती है। दुनिया के सारे बच्चे ऐसी ही यादों को सहेजकर बड़े होते हैं। मन में ऐसी ही याद एक नाम की है जो मेरे जीवन की सबसे पहली यादों में बसा है। मेरे जन्म की जगह...ऋषिकेश।


उस वक़्त ऋषिकेश एक कस्बा हुआ करता था। कुछेक तांगे सड़कों पर दिखाई देते। रोडवेज़ की बसें, ठेलियाँ, बजाज के दुपहिया चक्के, साइकिलें, सब कुछ एक पतली सी पक्की सड़क के बीच में बहुत कम संख्या में दौड़ते। सड़क के किनारे फुटपाथ यूकेलिप्टिस की छाँव से खेलते। ऋषिकेश एक दैविक मान्यता से घिरा स्थल है। लेकिन जब मैंने  ऋषिकेश नाम को जाना तो मुझे लगा कि ऋषियों के कारण  ये नाम पड़ा होगा। काफी कुछ सत्य भी था। किवदंतियों में कहा जाता है ऋषि रैभ्य ने इस स्थान पर ईश्वर के दर्शन के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान हृषीकेश के रूप में प्रकट हुए। तब से इस स्थान को ऋषिकेश नाम से जाना जाता है। दूसरी कथा के अनुसार देवासुर संग्राम में समुद्र मन्थन के दौरान निकला पहला रत्न विष निकला, जिसे शिव ने इसी स्थान पर पिया था। मिथकों में यह भाग अलकापुरी की सीमा में बताया गया है। वही अलकापुरी जो यक्षों के स्वामी कुबेर की नगरी है जिसकी पृष्ठभूमि में महाकवि कालिदास ने वियोग श्रृंगार रस का महाकाव्य 'मेघदूतम' रचा था।


इन सब कहानियों से सराबोर होती हुई पर्वतों से दौड़ती गंगा इस स्थान पर बैठकर त्रिवेणी कहलाती है। त्रिवेणी याने गंगा, यमुना, सरस्वती का संगम। लेकिन मेरे लिए ये एक नदी का किनारा था जिस पर साधु-संत, भिखारियों की पंक्तियां और सामान्य लोग दिखाई देते। कुछेक प्रतिष्ठान उस पतली सी गली में आस-पास थे। कहीं गुड़िया के गुलाबी बाल एक डण्डे पर बँधे एक कन्धे के सहारे पूरा शहर घूमते जिन्हें देख मन ललचाता । चार पैरों पर खड़े खोखे जैसी संरचना के भीतर संतरे की टॉफियाँ प्लास्टिक के डब्बों से मेरे मुख की लार को आकर्षित करती।  सोडा वाली बोतलें जिसके मुख पर कंचा तैरता था, चाट-पकौड़ियों की कुछ ठेलियों के साथ खाने-पीने के शौकीन लोगों का इंतज़ार में चमकती रहती। कुछ अन्य दुकानें भी थी एक दुकान में फोटोग्राफर फ़ोटो खींचने का काम करता। फ़ोटो को एक बार में क्लिक करवाना उसकी जिम्मेदारी थी। एक दिन जब हम भाई-बहिन को उस दुकान के भीतर फ़ोटो खींचने एक बेंच पर बैठाया गया तो उसने हमें एक प्लास्टिक की गुड़िया दी उसके बाद 'आहा...आहा' करके हमारी गर्दन उठवाने की कोशिश में उसने बड़ी देर में एक फोटो निकाली। 


एक दिन याद आता है जब मैं चार साल की थी और मेरे पिता ने मेरी उम्र पाँच वर्ष लिखवा मेरा दाखिला करवाया। एक वर्ष वरिष्ठ तो मैं उसी दिन हो चुकी थी ये काफी बड़ी उपलब्धि रही क्योंकि आज भी अपनी इस उपलब्धि पर मैं मौन रहना स्वीकार करती हूँ क्योंकि स्त्री जाति पर वैसे भी उम्र का प्रभाव ज्यादा ही हो जाता है। राजकीय नियमों में हाई स्कूल के दस्तावेज बड़े महत्वपूर्ण हैं । उन पर जन्म दिनाँक अंकित हो जाये तो इसे गलत सिद्ध करना दुर्लभ है याने आज दसवीं के प्रमाण पत्र सही नहीं हो सकते या कहे कि वो साल जो मैंने जिया ही नहीं मेरा साथ कभी नहीं छोड़ेगा । खैर इसके कतिपय फायदे लौटती ज़िंदगी में शायद कुछ हो जाये। बच्चे के स्कूल जाने के प्रथम दिवस में काफी विशेषताएं होती हैं । परिवार से बाहर दुनिया में पहला कदम। कितनी अंजानी सी राह...पेड़ की छांव को छोड़ते पंछी की तरह। 


               मुझे आज भी वो दिवस बखूबी याद है। हमारे घर में एक पुरानी सी साईकल थी "एटलस" कंपनी की उस साइकिल के डण्डे पर आगे एक गद्दी लगी थी । उस साईकल में आगे बैठकर अपने स्कूल की सवारी बहुत दिनों तक की। साईकल जीवन को सुगमतापूर्ण जीने का एक साधन था । मेरे लिए तो वो मर्सीडीज ही थी । चार सौ की इस साईकल में वो संतोष था जो आजकल जीप कंपास , औडी की गाड़ियों में भी नहीं मिलता। अधिकतर लोगों को इनकम टैक्स वालो का भय अलग दिल का मरीज भी नहीं बनाता था। साईकल के ज़माने की भी अपनी यादें हैं । हर घर में साईकल को रोज़ चमकाया जाता था और फिर वो भी बड़े रौब में चलती थी। अपने स्कूल की पहली बार यात्रा इसी में बैठकर की जानी थी। माँ ने बड़े प्रेम से सांवले रंगत पर मेरी बड़ी बड़ी आँखों मे काजल लगाया । आंखों को पार करता काजल । फिर मेरे पिता ने मुझे उस साइकिल पर आगे गद्दी में बिठा स्कूल के बाहर उतारा।


             मुझे उस अजनबी जगह में 'घर' नहीं दिखा ये मेरे लिए बड़ा अप्रत्याशित रहा । मैंने वहाँ रौद्र रूप में तेज स्वर में रोना शुरू किया। वैसे भी बालहठ से बड़ी कोई चीज़ नहीं होती । ये कृत्य कुछ ज्यादा ही प्रभावी रहा होगा क्योंकि मुझे याद है कि मेरे पिता ने गुस्से में मेरा हाथ पकड़ कर ज़बरदस्ती स्कूल की तरफ धकेला। मैं ज़मीन पर गिर गयी। प्रतिमा मैडम मुझे लेने आई थी और वो मुझे देखती ही रह गयी। मैं वापिस घर आ गयी। उसके बाद मुझे बाथरूम में बंद करवाकर स्कूल जाने के लिए हाँ करवाई गई ठीक जैसे निकाह होने पर जबरन हाँ करवाई हो और फिर उसी दिन दोबारा अपनी आंखों को काजल में सना मैं स्कूल गयी प्रतिमा मैडम ने टॉफ़ी देकर मुझे चुप कराया और अंदर ले गयी लेकिन सच कहूँ तो उस समय मैं मैडम से नज़रें नही मिला पा रही थी। उनके सामने अपमान जो हो गया था। वो मेरी पहली अध्यापक थी जिनके बारे में काफी दिनों में मालूम हुआ कि घरेलू समस्त ज़िम्मेदारियों को निभाने हेतु उन्होंने विवाह नहीं किया।आज सोंचती हूँ उस वक़्त का सामाजिक मूल्य का कितना कठिन कदम उन्होंने उठाया था। स्कूल की उस पहली घटना के बाद आज दिवस तक किसी भी मौसम या हालात में मैंने कोई कक्षा ज़िद की वजह से कभी नहीं छोड़ी।


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