जीवन की बहुत सी उदास और शांत शामों में वो भी एक शाम थी। रेलगाड़ी की द्वितीय श्रेणी में कमबख्त एक खिड़की थी ,जो मुझसे बातें करना चाहती थी। हर बात को साफ़गोई से कहना चंचलता की निशानी है। चंचलता को अक्षुण्ण रहना चाहिए क्योंकि संसार की कठोरता में ये गुम हो जाती है। उस दिन चंचलता बाहर की दुनिया से विलग हो उस खिड़की से भाग जाना चाहती थी। शाम उस डब्बे में आस - पास कुछ बातों और ठहाकों का शोर था किंतु मेरी आंखें उस किनारे वाली खिड़की से वक्त का गुज़रना देख रही थी...खामोश सफ़र था लेकिन मन में हलचल थी। रेल के उस डब्बे में कोलाहल था मेरे साथ कॉलेज के अन्य लड़के व लड़कियां भी थी उनके अपने शौक़ थे और अपने दोस्त भी। उस सबमें मेरा दोस्त या दुश्मन कहलाने वाले कोई विशेषताएं भी नहीं थी। मेरी पसंद - नापसंद इतनी विचित्र थी कि उन सामान्य लोगों ने मुझे अकेला ही छोड़ दिया था।
कोयंबटूर से दिल्ली के लिए हम सभी रवाना हुए थे। पिछली शाम मैं एटीएम से पैसे नहीं निकाल सकी थी । साथ में एक लंबी स्ट्रिंग वाला पर्स था जिसकी एक जेब में कुल जोड़ -जमा 100 रुपए थे।यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर भी डिब्बे में हमें देखने आ रहे थे। मैंने उन्हें देखते ही उनसे पूछा कि उनके पास कुछ 500 रुपए होगें? उन्होंने इस तरह बेहद तीक्ष्ण अंदाज़ में अपनी जेब की असमर्थता बताई कि मुझे स्वयं पर अफ़सोस हुआ। मेरी वर्तमान आयु उस वक्त उनकी आयु के समान रही होगी आज मै यह कह सकने में सक्षम हूं कि उस समय उनके द्वारा किया गया व्यवहार सही नहीं था क्योंकि उनकी ज़िम्मेदारी सभी छात्र - छात्राओं की थी। मान्यता है कि कॉलेज में नौकरी करने वाले लोग हमेशा युवा बने रहते हैं। यदि ये परिस्थितिवश सत्य भी हो तो भी शैक्षिक डिग्री धारक प्रोफेसर को पुरुषप्रधान निर्मित युवा अपरिपक्व हंसी में प्रतिभाग कर स्त्री के प्रति कर्तव्यहीनता नहीं दर्शानी चाहिए। यूनिवर्सिटीज के टूर कार्यक्रमों में उत्तरदायित्वों के साथ मजबूरी रहती होगी कि लड़कियों के साथ एक महिला भी शामिल की जाए। हमारे साथ भी एक महिला थी। विडंबना ये थी कि उनके पति भी हमारे साथ थे। दक्खिन के पूरे टूर पर वह अपने पति से विभिन्न वस्तुओं की खरीदारी की ज़िद करती। हम लोग उनका रूठना- मनाना ही देखते रहते। शायद ही किसी साथी लड़की ने उनसे कभी कोई शिकायत की होगी। कमोबेश टूर ठीक से पूर्ण हो चुका था और हम सब टूर को पूरा कर वापिस लौट रहे थे।
ट्रेन चल रही थी और तीसरी रात दिल्ली पहुंचना था। देखिए न, दुनिया की सारी बातें पैसों से शुरू होती हैं और पैसों पर ही अंत हो जाती हैं। इन पैसों में दो दिनों तक गुज़ारा करना थोड़ा कठिन जान पड़ता था। एकांत स्वयं को जानने का सबसे उपयुक्त साधन है। आप स्वयं एकांत ढूंढ लें या फिर आपको एकांत के गर्त में डाल दिया जाए... दोनों ही मामलों में आत्मअनुभव प्राप्त होता है। खिड़की से हवा मुझे छूकर जगा रही थी और मेरी आंखों के आगे रात के अंधेरे में समय के चमकते हिस्से गुजर रहे थे।
उस दिन भूख नहीं लगी। बस शाम गुज़री और रात्रि के पहर अपनी बारी का इंतजार करते रहे। न जाने नींद कब आंखों में उतर आई। सुबह 4 बजे के आस- पास अपने पैरों के पास किसी के बैठने को महसूस किया । उस तरफ देखा तो 27 या 28 साल का कोई व्यक्ति था। उम्र में सटीक होना सिद्ध नहीं हो सकता किंतु उसके चेहरे में गंभीरता एवं स्वभाव में शिष्टता का अतिरेक था। वो सीट पर टिकने मात्र ही सधा था। उसमें असहजता थी। मैं उठकर बैठ गई और उसे ठीक से बैठने को कहा।उसके साथ कुछ केरल की लड़कियां भी उस डब्बे में आ गई थी। कुछेक अन्य लड़के भी थे। उन सबके पास टिकट की क्या स्थिति थी इस तरफ़ तो ध्यान ही नहीं गया। वो सारे लोग आपस में मित्र थे वो तमिल और मलयालम जैसी भाषाओं में बात कर रहे थे। मुझे बस तीव्र र एवं ट का उच्चारण ही अधिक सुनाई पड़ता। मलयाली लड़कियां बीच -बीच में मुझे मुस्कुराते हुए देखती । शायद वो मुझसे बात करना चाहती थी लेकिन भाषाई विच्छिन्नता हमारे बीच अंग्रेजी भाषा का सेतु निर्मित कर रही थी। इसी बीच मेरी सीट पर बैठे उस व्यक्ति ने बताया कि वो तमिलनाडु से है और हिमाचल में सी0आई0डी0 में कार्यरत है। वो हिंदी समझ सकता था इसलिए कुछ देर के लिए वो मेरे और उन मलयाली लड़कियों के बीच ट्रांसलेटर बन गया था। इसी बीच उसने अपने गांव का नाम भी बताया और कहा कि वो अपने माता - पिता की इकलौती संतान है। कुछ घंटों के सफ़र के बाद उसने मेरे सहपाठियों को देखते हुए पूछा, " क्या ये आपके साथ है?"
"हां"
"ये आपसे बात क्यों नहीं करते?"
"ये तो उन्हें ही पता होगा लेकिन मैं भी उनसे बात नहीं करती।"
"टूर में तो सबको साथ में बोलना ही चाहिए।"
"जब ज़रूरत होगी तो बोलेंगे।"
"आपका नाम नहीं पूछा।"
"सीमा"
इसके बाद उसने मुझसे नाश्ता करने को पूछा। मैंने उसे मना कर दिया। फिर उसने उन सभी साथियों के साथ नाश्ता किया। उसके बाद वो वापिस मेरी सीट पर आकर मेरे साथ बात करने लगा।
उस समय ट्रेन में कुछ लोकल सामान बेचने वाले आ जाते थे। एक महिला एक टोकरी लिए अंदर चली आई थी। उस टोकरी में हरे अमरूद थे। 10 रुपए में 5 अमरूद । अमरूद इतने कच्चे थे कि दांतों के साथ अधिक सख़्त हो टकराव की विशेषता रखते किंतु अन्य वस्तुओं की तुलना में ये सौदा सस्ता था। मैंने उसे 100 रुपए दिए उसने 90 रुपए वापिसी के साथ एक लिफ़ाफे में हरे अमरूद। वो व्यक्ति मेरे सामने ही बैठा था। बहुत देर तक तो अमरूद खाने की हिम्मत ही नहीं हुई क्योंकि वो इतने कच्चे हरे थे कि वो किसी को खाने के लिए देना ठीक नहीं लगा कुछ देर बाद मैंने उसके सामने ही वो अमरूद खा लिया। वो शायद मुझे देखता रहा । लगभग दोपहर के 12 बजे थे। इतने में किसी स्टेशन पर एक महिला एक बच्चे को गोद में लेकर बोगी के भीतर आ गई। उसने मेरे आगे खाने के लिए अपना हाथ फैला दिया। उसने पैसे भी मांगे होते तो मुझे देने ही पड़ जाते लेकिन उसने खाना मांगा। मैंने चारों अमरूद उसे दे दिए। पता नहीं ये कैसा फैसला था दिमाग़ अधिक प्रभावी था या फिर दिल... ये कहना मुश्किल है। हालांकि भूख में इंसान को सब खाने योग्य लगता है। अमरूद लेने के बाद वो महिला चली गई।
वो अभी भी साथ में ही बैठा था लेकिन दोपहर लगभग 2 बजे उसे उसके साथियों ने खाने को बुलाया। मैने अभी तक उसका नाम नहीं पूछा था। उसने मुझसे भी खाने के लिए कहा किंतु मैने उसे मना कर दिया। वो थोड़ी देर के लिए चला गया। मैं खिड़की के बाहर क्षितिज तक के खेतों को देखने में व्यस्त हो गई। मेरे साथ के टूर वाले एक दो लोग मुझे खाने के लिए पूछने आए किंतु उन्हें अपनी माली हालत बता सकूं ये अर्हता उनमें नहीं थी। मैं तो इंतज़ारी में थी कि कब 10 रुपए में आलू- पूरी वाले स्टेशन आएं तो शेष 80 रुपए पर्याप्त हो जाए। ऐसा सोच ही रही थी कि वो वापिस आ गया। इस बार ट्रेन में चाय वाला आया। उसने मुझसे पूछे बिना चाय वाले को दो चाय बनाने को कहा। मैंने तुरंत उससे कहा, "ये दूसरी चाय किसलिए? मैं चाय नहीं पीती।" फिर उसने एक चाय ली।
लौहपथगामिनी अपनी गति में छुक -छुक चल रही थी। दूर तक पसरी खामोशी के बीच उसने मुझसे पूछा, " आप कुछ खा लीजिए। "
इस बार मैंने उससे कहा "मेरे पास पैसे नहीं हैं। एटीएम से पैसे नहीं निकाल सकी। "
"मुझसे ले लीजिए। बाद में दे देना।" उसने कहा।
"नहीं...."
इस बीच उसने उसके सभी लोगों से कुछ बातें की। उस समय गूगल जैसी सुविधा हाथों में नहीं थी। नोकिया के फ़ोन यदा -कदा दिखने लगे थे। शाम 6 या 7 का समय था। उसने फिर कहना शुरू किया, " सुनिए, रात 1 बजे ट्रेन नागपुर स्टेशन पर रुकेगी। स्टेशन पर ही एटीएम है। वहां हम उतरकर पैसे निकाल लेंगे"।
"ट्रेन छूट गई तो?"
" ट्रेन वहां 5 मिनट रुकती है। " उसने कहा।
उसके सारे दोस्त भी मुझे ही एकटक देख रहे थे। इसी बीच एक लड़की मलयालम और अंग्रेजी को मिलाकर बोली कि यदि ट्रेन चली तो वो सब ट्रेन रोक लेंगे। मुझे ये कुछ अस्थिर किंतु संतोषजनक बात लगी।
रात 12 बजे बाद वो सभी लोग मेरे साथ स्टेशन का इंतजार करने लगे। इत्तेफाक की बात थी कि उस दिन ट्रेन नागपुर स्टेशन के थोड़ा पहले खड़ी हो गई, जिसे हम आउटर कहते हैं। उतरने एवं न उतरने की कशमकश में 5 मिनट तो ट्रेन के गेट पर ही व्यर्थ हो गए। लेकिन हम उतरे....पहले वो और उसके बाद मैं। हम लगभग भागते हुए अंधेरे में दूर चमकते स्टेशन की तरफ़ बढ़ने लगे। वहां पहुंचने तक तो मेरी सांस ही फूल गई। जैसे ही पहुंचे वैसे ही हमारे पीछे - पीछे ट्रेन भी पहुंच कर रुक गई। स्टेशन बाईं ओर था उसी में एसबीआई का एटीएम लगा था। मैं तुरंत उसमे जाने लगी तो वहां खड़े एक गार्ड ने कहा, "मैडम एटीएम खराब है"।
वो मेरे साथ ही था। उसने तुरंत गार्ड से पूछा," आस -पास कोई दूसरा है"?
" यहां से बाहर निकलकर 200- 300 मीटर पर पीएनबी का है"। गार्ड ने कहा।
उसने मुझसे कहा,"जल्दी आओ"।
हम दोनों ही स्टेशन से शहर की ओर बाहर भागते - भागते आए....एटीएम दौड़ने वाली सड़क की तरफ़ के दूसरी ओर दिखा। सड़क लगभग 35 फीट चौड़ी थी। इतनी रात भी वहां गाड़ियों की आवाजाही थी।
सड़क पार करना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल काम ही रहा है। मुंबई की सड़के और लोकल का अनुभव ही मेरे लिए पर्याप्त था। मैंने तो ऋषिकेश की सड़कें भी अकेले बमुश्किल पार की हैं। जीवन में अक्सर ऐसा होता रहा कि कई ऐसी सड़कों पर मुझे पुलिस सड़क पार करवाती रही। कमोबेश अभी भी ऐसा हो जाता है। इतने लंबे समय को पार करने के बाद भी एक सड़क पार करना मेरे लिए मुश्किल हो जाता है। इस समय भी ये बात सही है, उस समय भी सत्य ही थी। वो तो चलती गाड़ियों के बीच से सड़क पार हो गया। मैं अवाक होकर इस पार ही रह गई। वो उधर सड़क के दूसरी ओर से मुझे बुला रहा था। गाडियां चल रही थी। मैं जैसे ही पैर बढ़ाती गाडियां सामने आ जाती। पता नहीं उसने क्या सोचा लेकिन वो तेजी से वापिस मेरी तरफ़ आया। तुरंत अपने बाएं हाथ से मेरी दाईं कलाई को कस कर पकड़ा और लगभग दौड़ाते हुए गाडियां रुकवाकर सड़क पार कराई। मैं एटीएम पहुंची और एटीएम से 5000 रुपए निकाल लिए। ट्रेन की सीटी सुनाई दी थी । भागते -भागते गला सूख गया था। स्टेशन पहुंचे तो ट्रेन चलने लगी थी । हमारा डिब्बा पीछे से आगे आया । उसके सारे साथी ट्रेन के गेट पर खड़े थे। डिब्बा सामने आने पर उन्होंने उसका हाथ पकड़ कर खींच लिया और फिर मुझे भी।
उन सब लोगों ने मिलकर मेरी मदद की थी। मेरा खाना न खाना उन सबने देखा था। उस समय वो सब लोग मुझसे अधिक खुश थे। सबने मुझे घेरा हुआ था। मेरे साथ के लोगों को तो कुछ ख़बर ही नहीं थी। इसी बीच वो मेरे पास आया। उसके हाथ में बड़े ग्लास में कोकाकोला और एक ब्रेड पकोड़ा का पैकेट था। मुझे ज़बरन थमाते ही उसने कहा," पैसे बाद में दे देना, ये ले लो"। इस बार मुझे उसकी बात माननी पड़ी। मैं वाकई में थक चुकी थी। गला मरुस्थल बन गया था। जिस खुद्दारी से मैंने उसकी चाय भी नहीं पी थी अब उसका ही खाने का अहसान मुझ पर चढ़ गया था। उसके बाद मैने पहली बार उससे बात की। उसका नाम भी पूछा....शायद वेंकटेश था। एक गृहशोभा या यामा जैसी किताब मेरे पास थी उसी में कहीं उसने अपना पता लिखा था और अपने ऑफिस का नंबर भी दिया था। जाने किस असमंजस में मैंने उसे अपना पता नहीं दिया । मैंने ही उससे एक -आध बार बात की थी।
जीवन के कई चीजों को सहेजकर रखने की आदत के बावजूद वो किताब नहीं मिल पाई। उस समय की कुछ शेष किताबें मेरे साथ ही चल रही हैं। आज भी बड़ी उम्मीद से हजारों बार उन्हें पलटकर देखती हूं लेकिन वो पता नहीं मिलता। जीवन में कुछ लोग अनायास निस्वार्थ भाव से आपके जीवन में आते हैं और फिर बिन आहट गुम भी हो जाते है। दिल्ली स्टेशन पर हम सब उतरे फिर अपने -अपने जीवन के लक्ष्यों की तरफ़ मुड़ गए। ऐसा लगता है कि उसकी स्मृति में मेरा अक्स रेल वाली लड़की जैसा छपा होगा। बावजूद इसके मुझे तमिल नहीं आती और उसे मेरा पता नहीं मालूम। अब ढूंढे तो ढूंढे कहां.....ये हम दोनों की समस्या बन गई और हम एक दूसरे के लिए विलुप्तप्राय हो गए।
०००००००
