Wednesday, 19 May 2021

1. पिता पर्वत की गोद

मेरी जीवन यात्रा, एक छोटी सी बेल पर खिले हुए पुष्प जितनी महत्वपूर्ण है। फूल खिलता है फिर धीरे - धीरे मुरझा जाता है। सारी चीज़ें पुरानी होकर खत्म होती हैं। ये सृष्टि का नियम है। मेरे होने का इतिहास मुझे ही लेखबद्ध करना है। कागज़ के युग भी जाता दिखाई देता है। डिजिटल कागज़ और स्याही भविष्य में किस रूप में होगी ये विचार मेरे जीवन के समय से कोसों दूर है। मैं तो उस समय की बात लिख सकती हूँ जो मुझे छूकर गुज़रा है। मेरा अपना समय जो नश्वर होता गया पुरानी होती चीज़ों की तरह। 

मेरा रिश्ता हिमालय से अनायास ही हो गया। उसके ही पहाड़ों में मेरे जीवन की डोर थमी। हिमालय के उस हिस्से का नाम था टिहरी गढ़वाल, जिसके एक गाँव मे मेरे दादा जी का भी एक घर था । दादाजी का नाम पुरुषोत्तम दत्त बंगवाल था। वे पूजा- पाठ का काम करते थे। उन्होंने खेती, पूजा-पाठ करने वाले लोगों के मध्य अपना अधिकांश जीवन बिताया इसलिए उनकी दुनिया उतनी बड़ी ही थी जितनी सिकंदर के समय सिकंदर की। फिर ऐसा होना लाज़मी भी था। जब दूरस्थ स्थानों में  किताबों का विज्ञान कोसो दूर हो । रोटी, कपड़ा, मकान का संघर्ष मिट्टी से मिलता हो। मोबाइल व टेलीविजन भविष्य की झोली में झूल रहा हो। सिर्फ़ बम फेंकने वाले देश के रूप में रेडियो पर अमेरिका का नाम सुनाया जा रहा हो और रेडियो की उपलब्धि विशिष्ट उच्च वर्ग की पहचान हो। ऐसे में दुनिया उसी स्थान के चारों ओर तक सीमित रह जाती है। 

दादाजी के लिए भी अधिक पढ़ा-लिखा होना अधिक महत्वपूर्ण नहीं था। मेरी बुआएं पढ़ी-लिखी नहीं थी। पुत्र होने के कारण मेरे पिता व चाचा को पढ़ने का अवसर मिला। मेरे पिता मेरे दादा जी से अधिक सज्जन स्वभाव के थे। आठवीं दर्जे तक पढ़ाई करने के बाद उन्होंने कई प्रकार के काम सीखे। जैसे बिजली के तारों का काम, लकड़ी का काम, रंग-रोगन का काम, मिस्री का काम। ऐसी लगनशीलता कहाँ से उनके अंदर आयी ये कहना मुश्किल है। उन्नीस या बीस वर्ष की आयु से वह ऋषिकेश आ गए व सरकारी महकमे में एक छोटी सी नोकरी करने लगे। वहीं दो कमरों के सरकारी आवास में सपत्नीक रहने लगे। मैं दो भाइयों के मध्य की संतान रही।

मेरे पिता बहुत शांत स्वभाव के व्यक्ति थे। मैंने कभी उन्हें बहुत अधिक बातें करते नहीं देखा । न ही दिल खोलकर हँसते देखा। अक्सर कई बार मैं हँसते - हँसते ज़मीन पर गिर जाती तब भी उनके मुख पर दंतपंक्ति नहीं दिखती थी। शायद उन्हें अपने जीवन का बेहद संतोष था शायद ही उनके कारण किसी को कभी कोई कष्ट हुआ हो। मेरे पिता का नाम लोकानन्द  था । लोगों में मान्यता है कि व्यक्ति का नाम उसके व्यक्तित्व पर प्रभाव डालता है। वैज्ञानिक रूप से ये भले सत्य न हो किन्तु उनके साथ ये सत्य ही लगता था। 

सदियों पहले वर्तमान उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्र की कल्पना एक घने दुर्लभ प्रदेश की भाँति की जा सकती है। अंग्रेजों की व्यवस्थाओं व अशोक के शिलालेख से कहीं पहले । पौराणिक मिथकों से कहीं पूर्व इस भूभाग में बसावट की शुरुवात हुई। मौलिक जातियों के बीच मैदानी क्षेत्रों की जातियाँ स्थापित हुई।  माना जाता है कि कुमाऊँ क्षेत्र के लोग मध्य भारत की धरती से यहाँ आए। गढ़वाल क्षेत्र के लोगों के बारे में भी मान्यता है कि महाराणा प्रताप के वंशज इस पहाड़ी क्षेत्र में आए और यहीं बस गए। साहित्यकार भी भाषा, बोली आधार पर विभिन्न मानक स्थापित करते रहे। 

मनुष्य की वंशावली का प्रयोग मात्र ऐतिहासिक तथ्यों की पूर्ति करने हेतु प्रसंशनीय होते हैं। वंशावली व डी0एन0ए0 में एकरूपता स्थापित नहीं की जा सकती। करोड़ो वर्षों से हमारे खून का मिश्रण होता रहा और आगे भी होता रहेगा। मानवीय उन्नयन में जाने मेरे पूर्वज अंध महाद्वीप से आये हों या फिर मध्य एशिया से। मानव के विभिन्न संकरणों से गुजरते हुए मेरा भी उद्भव हुआ। चूँकि समाज में कुल व गोत्र परम्पराराएँ प्रासंगिक रहती हैं इसीलिए मेरे मन में भी विचार आया कि मैं अपने कुल के प्रथम पुरुष तक पहुँच पाऊँ। एक दिवस मेरे दादा जी से मैंने ये प्रश्न पूछा तो दादा जी के दादा जी तक ये क्रम पहुँच सका उससे अधिक जानकारी उन्हें नहीं थी।


एक बार मैंने अपने पिता से पूछा, " ब्राह्मण में इतनी जातियाँ क्यों हैं?"

" हमारा गोत्र भारद्वाज है। गढ़वाल में कई जातियाँ है। ब्राह्मणों के प्रकार है। सरोला व गंगाड़ी ब्राह्मण होते हैं।" पिता ने कहा।


"हम कौन से ब्राह्मण हैं?" मैंने प्रश्न किया।


" बंगवाल जाति गंगाड़ी ब्राह्मण में आते हैं। ये लोग पर्वत की तलहटी में रहते हैं । गंगाड़ी के अलावा सरोला ब्राह्मण भी पहाड़ में रहते हैं । सरोला पर्वतों की चोटियों पर रहते हैं। अब चूँकि ये राजदरबार के ब्राह्मण रहे तो उत्सवों में इनके द्वारा ही भोजन बनाया जाता है।" उन्होंने कहा।


"तो फिर क्या पर्वतों के ऊपर बसने से या फिर राजा की रसोई बनाने से ये श्रेष्ठ हैं?" मैंने पूछा।

" नहीं , यदि ऐसा होता तो सरोला व गंगाड़ी आपस मे वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं करते। गोत्रों में समानताएं मिलती हैं। बंगवालों का गोत्र भारद्वाज है। " उन्होंने कहा।


दरअसल मेरी जाति के लोग मध्यप्रदेश से गढ़वाल के बांगा गांव में बसे थे। हालाँकि साहित्यकार व स्थानीय तथ्यों में मतभेद मिलते हैं । जो भी सत्य रहा हो किन्तु संसार के किसी भी भूभाग पर एक सदी रहने के बाद मूल निवासी का दर्जा मिल जाता है। मनुष्य के सौ बरस के औसत जीवन में वंशावली का महत्व इतिहास जानने के लिए ज़्यादा आवश्यक है बनिस्पत रंग, जाति, धर्म के मानकों का महिमामण्डन करने के। इसके बावजूद नस्लों की छ्द्म विरासतें वंशो में जन्म लेने के नाम पर आत्मगौरान्वित होती हैं ।

वंशावली के नाम जैविक गर्भ के अतिरिक्त अन्य संदर्भ साक्ष्य से सिद्ध नहीं किए जा सकते। इसके बावजूद विभिन्न सामाजिक वंशावलियों में शुद्धता के मानक स्पष्ट किए जाते हैं। विकासवादी सिद्धान्त में इस प्रकार की व्यवस्थाओं से धर्म, क्षेत्र व जाति आधार पर बहुत से समाज स्थापित हैं। वंशावली में अक्सर एक 'सर नेम' की परंपरा होती है जिस कारण मुझे भी 'बंगवाल' सर नेम विरासत में मिला। इससे मुझे कुछ उपलब्धियां अनायास से हुई। जैसे मेरे नाम से ब्राह्मण व उत्तराखण्ड मूल स्वतः परिभाषित हुआ।



8 comments:

  1. बहुत अच्छा है स्मृतियों का लेख जोखा और उसकी पड़ताल।
    गहरी काली पृष्ठभूमि पर झक्क सफेद आंखों में चुभता है।

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    1. शुक्रिया। भैया ....इसके रंग बदलने हैं।

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  2. GD Hospital Rishikesh Isn't it?minute observation nice imagination impresive descripyion very sophisticated polished and fine language Now u should write story reviews or travelogue etc
    I'm proud of such a great daughter of mine.

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    1. Yes sir.
      आपका दिल से शुक्रिया🙏💐

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  3. प्रारंभिक अंश कुछ अरोचक सा है लेकिन बाद के विस्तार में स्मृतियों का सुंदर लेखा जोखा है। अंतिम पैरा भी सुंदर बन पड़ा है देश के साथ काल का विवरण यथा सोवियत रूस का पतन प्रासंगिक है।

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  4. प्रारंभिक अंश कुछ अरोचक सा है लेकिन बाद के विस्तार में स्मृतियों का सुंदर लेखा जोखा है। अंतिम पैरा भी सुंदर बन पड़ा है देश के साथ काल का विवरण यथा सोवियत रूस का पतन प्रासंगिक है।

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  5. बचपन में प्रश्नों का मन मे आना स्वाभाविक है किंतु यदि नकारात्मक प्रतिक्रिया प्राप्त होती है तो बच्चे प्रश्न पूछना बंद कर देते हैं।
    मां बाप झूठे जवाबों से बच्चों को बहलाने का प्रयास करते हैं । जो बच्चे बचपन में बहल जाते हैं वे जीवन भर लकीर के फकीर बने रहते हैं।
    मां बाप सोचते हैं वे जीत गए लेकिन वे हार जाते हैं ।

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